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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अध्याय १ शुद्ध भक्तियोग के लक्षण श्रीमद्भागवत (३.२६.१२-१३) में माता देवहूति को उपदेश करते हुए भगवान् कपिल ने शुद्ध भक्तियोग के ये लक्षण बताए हैं, "हे जननि ! जो मेरे शुद्धभक्त हैं, जिन्हें सकाम कर्म अथवा ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं, उनका चित्त मेरी सेवा में इतना तन्मय रहता है कि वे मुझसे उस सेवा के अतिरिक्त कभी और कुछ अभिलाषा नहीं करते । यहाँ तक कि मेरे धाम में रहने की इच्छा भी वे नहीं करते ।" मुक्ति के पाँच भेद हैं : सायुज्य (भगवान् से एक हो जाना); सालोक्य (भगवान् के लोक में वास); सारूप्य (भगवान् के समान रूप की प्राप्ति); साष्टि (भगवान् के समान ऐश्वर्य की प्राप्ति); और सामीप्य (भगवान् के संग में रहना) । प्राकृत इन्द्रियतृप्ति की तो बात ही क्या, भक्त तो किसी प्रकार मुक्ति भी नहीं चाहता । वह तो बस प्रेममयी भगवत्सेवा में ही संतुष्ट रहता है । यह शुद्ध भक्तियोग का लक्षण है । श्रीमद्भागवत से उद्धृत कपिलदेव के उपरोक्त वाक्य में शुद्धभक्त की यथार्थ स्थिति के साथ ही भक्तियोग के सामान्य लक्षणों का भी विवेचन है । श्रील रूप गोस्वामी ने शास्त्र-प्रमाण के आधार पर भक्ति के लक्षणों का आगे वर्णन किया है । वे कहते हैं कि शुद्ध भक्तियोग के छः लक्षण हैं : १. शुद्धभक्ति क्लेशघ्नी है, अर्थात् सब प्रकार के प्राकृत क्लेशों को तत्काल शान्त कर देती है । २. शुद्धभक्ति शुभदा है, अर्थात् सब प्रकार से कल्याण करने वाली है । ३. शुद्धभक्ति अपने-आप अपरिमेय दिव्य आनन्द में स्थित कर देती है । ४. शुद्धभक्ति परम दुर्लभ है । ५. शुद्धभक्ति मोक्ष को भी तुच्छ बना देने वाली है ।