भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ ६ ६. शुद्धभक्ति श्रीकृष्णकर्षिणी है, अर्थात् श्रीकृष्ण को आकर्षित करने का एकमात्र साधन है। श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं, परन्तु शुद्धभक्ति उन्हें भी अपनी ओर आकृष्ट करने वाली है। भाव यह है कि शुद्धभक्ति श्रीकृष्ण से भी अधिक दिव्य बलवती है; कारण, वह श्रीकृष्ण की अंतरंगा शक्ति है। क्लेशघ्नी (भक्ति से क्लेशों की शान्ति) भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि अन्य सब कर्तव्य त्याग कर जीव को उनके शरणागत हो जाना चाहिए। शरणागत जीवों की सम्पूर्ण पापों से रक्षा करने का उनका वचन है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि इस जन्म के पाप और पूर्वकृत पाप—दोनों क्लेश के कारण हैं। सामान्यतः पापकर्म अविद्या के कारण घटते हैं। परन्तु अविद्या के नाम पर पापफल से बचा नहीं जा सकता। पाप के फल दो प्रकार के होते हैं: प्रारब्ध और अप्रारब्ध। जिन पापकर्मों को हम वर्तमान में भोग रहे हैं, वे प्रारब्ध हैं। जो अभी फलोन्मुख नहीं हुए हैं, वे संचित पापकर्म अप्रारब्ध कहलाते हैं । उदाहरण के लिए, जैसे कोई मनुष्य बहुत अपराध करने पर भी अभी पकड़ा न गया हो। परन्तु जब उसका पता लगेगा, तुरन्त ही वह बंदी बना लिया जायगा । इसी प्रकार, अपने अप्रारब्ध पापों का फल हमें भविष्य में प्राप्त होगा, जबकि प्रारब्ध पापकर्मों का फल अभी भोगना पड़ रहा है। इस प्रकार पापकर्मों और उनके परिणाम में होने वाले क्लेशों की एक श्रृंखला सो चलती रहती है। इस प्रकार बँधा हुआ जीव जन्म- जन्मान्तर में इन पापों के कारण दुःख भोग रहा है। वर्तमान में पूर्वपापों का फल भोगते हुए भी भावी जीवन के लिए दुःखों के नए बीज बोता रहता है । भीषण रोग, अभियोग, अधम जाति में जन्म, विद्या और रूप का अभाव—ये सब प्रारब्ध पापकर्म के लक्षण हैं । पूर्व पापों के बहुत से फलों को हम वर्तमान में भोग रहे हैं और क्रियमाण पापकर्मों का क्लेश आगे भोगना पड़ेगा। परन्तु यदि हम कृष्ण- भावनाभावित हो जायें, तो ये सब पापकर्मफल अविलम्ब शान्त हो सकते हैं। इसके प्रमाण में रूप गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत, ग्यारहवें स्कन्ध के चौहदवें अध्याय से उन्नीसवें श्लोक को उद्धृत किया है। उद्धव को उपदेश करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! मेरी भक्ति प्रज्ज्वलित अग्नि के समान है, जो ईंधनरूपी अपार पापराशि को भस्म कर सकती है।” तात्पर्य यह है कि जैसे प्रचण्ड अग्नि ईंधन के बड़े से बड़े