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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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१० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अम्बार को भस्मसात् कर सकती है, वैसे ही कृष्णभावनाभावित भगवद्- भक्ति सम्पूर्ण पापराशि को समूल नष्ट कर देती है। इसका उदाहरण गीता में है। अर्जुन सोच रहा था कि युद्ध करना पाप है; परन्तु श्रीकृष्ण ने स्वयं आज्ञा देकर उसे युद्ध में लगाया, जिससे लड़ना भी भक्तियोग बन गया। यही कारण है कि अर्जुन को पापकर्म का फलरूपी कुछ भी दोष नहीं हुआ। श्रील रूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत से एक और प्रमाण (३.३३.६) देते हैं, जिसमें देवहूति अपने पुत्र भगवान् कपिल से कहती हैं, “प्रभो ! भक्तियोग के श्रवण, कीर्तन, आदि नौ साधन हैं। जो कोई भी आपकी लीला का श्रवण करता है, आपकी पावन कीर्ति का गान करता है, आपकी वंदना करता है अथवा स्मरण आदि भक्ति का एक भी साधन अंगीकार कर लेता है, वह चाहे परम अधम चाण्डाल-कुल में ही क्यों न जन्मा हो, परन्तु भक्ति- योग के प्रताप से तत्काल पवित्र होकर यज्ञ करने के योग्य हो जाता है।” अस्तु, जो पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होकर यथार्थ में भक्तियोग में तत्पर है, यह कैसे हो सकता है कि वह पवित्र न हो गया हो ? ऐसा नहीं हो सकता। कृष्णभावना और भक्तियोग के परायण पुरुष निश्चित रूप से प्राकृत पापकर्मों के सम्पूर्ण दोषों से मुक्त हो चुका है। अतएव भक्तियोग में वस्तुतः सब पापों को भस्मभूत करने की शक्ति है। फिर भी भक्त निरन्तर ध्यान रखता है कि उससे कोई पाप न बन जाय; यह भक्त की विशेषता है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत का निर्णय है कि भक्तियोग में तत्पर होने पर चाण्डाल-कुल में उत्पन्न मनुष्य भी वैदिक यज्ञ करने का अधिकारी बन जाता है। इस वाक्य में संकेत है कि चाण्डाल-कुल का मनुष्य सामान्य रूप से यज्ञ करने के योग्य नहीं होता। वैदिक यज्ञों का अधिकार ब्राह्मणों को है; अतः ब्राह्मण बने बिना कोई भी ये कर्म नहीं कर सकता। पूर्व कर्मों के अनुसार ही मनुष्य का जन्म ब्राह्मण अथवा चाण्डाल- कुल में होता है। जिसका जन्म चाण्डाल-कुल में हुआ है, उसने अवश्य पूर्वजन्म में पाप ही पाप किए होंगे। परन्तु यदि वह भक्ति-पथ को अंगी- कार करके 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे'—यह कीर्तन करे, तो वह तत्काल यज्ञ, आदि कर्मों के योग्य हो जाय। भाव यह है कि उसका पापकर्मफल तुरन्त दूर हो जाता है। पद्मपुराण के अनुसार, पापकर्मों के चार प्रकार के फल होते हैं :