भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ ११ १. अप्रारब्ध, २. बीज, ३. प्रारब्ध, और ४. कूट । यह भी उल्लेख कि जो पुरुष भगवान् विष्णु शरणागत होकर पूर्णरूप से कृष्णभावना- भावित भक्तियोग में तत्पर हों, उनके ये चारों प्रकार के पापफल तत्काल विलीन हो जाते हैं। 'प्रारब्ध' फल उन्हें कहते हैं, जो वर्तमान में भोगे जा रहे हैं। 'बीजफल' हृदय में बीजरूप में रहते हैं। 'कूट' फल वे हैं, जो प्रकट होना ही चाहते हैं। 'अप्रारब्ध' उन कर्मों का द्योतक है, जिनके फल अभी अंकु- रित नहीं हुए। पद्मपुराण के इस वाक्य से ज्ञात होता है कि प्राकृत कर्मों का बन्धन बड़ा दुर्बोध है। उसका आदि, फलन, परिणाम तथा दुःखरूप में भोग—यह सब एक बड़ी श्रृंखला है। कोई रोग हो जाने पर यह कहना बड़ा कठिन है कि वह किस कारण से हुआ, कहाँ से आरम्भ हुआ, कैसे बढ़ रहा है, इत्यादि। परन्तु रोग का क्लेश अकस्मात् प्रकट नहीं होता। उसे समय लगता है। जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में पूर्वोपाय के रूप में डाक्टर रोग के संक्रमण को रोकने के लिए टीका लगाते हैं, वैसे ही सब प्रकार के पापकर्मों को फलित होने से रोकने के लिए पूर्णतया कृष्णभावना- भावित कर्मों के परायण हो जाना आवश्यक है। इस संदर्भ में, श्रीमद्भागवत (६.२.१७) में शुकदेव गोस्वामी ने अजामिल की कथा का उल्लेख किया है। उसने अपना जीवन एक कुशल और कर्तव्य-परायण ब्राह्मण के रूप में प्रारम्भ किया था; परन्तु यौवन में वेश्या-संग से बिल्कुल भ्रष्ट हो गया । फिर भी, अपने पापमय जीवन के अंत में नारायण नाम पुकारने के फलस्वरूप उसका सब पापों से उद्धार हो गया। शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि तप, दान, व्रत आदि से पापों का नाश तो हो जाता है; परन्तु हृदय से पाप-बीज का नाश नहीं होता, जैसा यौवन में अजामिल के साथ हुआ । इस पाप-बीज का नाश एकमात्र कृष्णभावनाभावित होने पर ही हो सकता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का सन्देश है कि कृष्णभावना की प्राप्ति हरेकृष्ण महामन्त्र का जप-कीर्तन करने से बड़ी सुगमतापूर्वक हो जाती है, अर्थात् भक्तिपथ को अंगीकार किए बिना पापों से पूर्ण शुद्धि नहीं हो सकती । वैदिक कर्म, दान, तप आदि के द्वारा कुछ काल के लिए पापफल से मुक्ति हो सकती है, परन्तु अगले ही क्षण वह फिर पाप में प्रवृत्त हो जाता है। उदाहरणार्थ, मैथुन की अधिकता के कारण रोगग्रस्त हुए व्यक्ति को चिकित्सा में भीषण कष्ट होता है; तब भी वह तात्कालिक रूप में ही ठीक हो पाता है। परन्तु हृदय से मैथुन की इच्छा को निर्मल न कर पाने