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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु से फिर विषयों में प्रवृत्त होता है और वही रोग एकबार फिर हो जाता है। अतः चिकित्सा के उपचार से यौन-रोग के कष्ट से तात्कालिक छुटकारा तो हो सकता है; परन्तु जब तक अभ्यास से यह समझ में नहीं आ जाता कि मैथुन तुच्छ (निन्दनीय) है, तब तक बारम्बार होने वाले ऐसे कष्ट से बचा नहीं जा सकता। इसी प्रकार वैदिक कर्म, दान, तप आदि से क्षणिक रूप में पापकर्मों का परिहार हो सकता है, पर जब तक हृदय शुद्ध नहीं हो जाता, तब तक बराबर पापकर्म बनते ही रहेंगे। श्रीमद्भागवत में एक दूसरा दृष्टान्त कुंजर-स्नान का दिया गया है। हाथी सरोवर में अच्छी प्रकार से स्नान करता है। फिर बाहर तट पर निकलते ही सारी देह पर धूलि डाल लेता है। इस उदाहरण से बताया गया है कि जिसे कृष्णभावना की शिक्षा नहीं मिली है, वह पापकर्म की वासना से पूर्ण मुक्त नहीं हो सकता। यह न योग से, न मनोधर्म से और न कर्म से ही सम्भव है। केवल भक्तियोग के परायण होने पर पाप-वासना से बचा जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२२.३६) में एक अन्य प्रमाण भी है। सनकादि कहते हैं, “हे राजन् ! मनुष्य का मिथ्या अहंकार इतना प्रबल है कि उसे भवबन्धन की रस्सी में जकड़े रहता है। कृष्णभावना के परायण होकर केवल भक्तजन ही इस दृढ बन्धन का सुगमता से छेदन कर सकते हैं। दूसरे, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं, परन्तु बड़े योगी अथवा कर्मी बनने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं, वे भक्तों की भाँति कर्म-बन्धन का मोचन नहीं कर सकते। अतः सबको चाहिए कि मिथ्या अहंकार और प्राकृत कर्मों की दृढ ग्रन्थी से छूटने के लिए कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण हो जायें।” मिथ्या अहंकार की यह दृढ ग्रन्थी अविद्या के कारण है। जीव जब तक अपने स्वरूप को नहीं जान जाता, तब तक अवश्य अनुचित कर्म करेगा और प्राकृत-बन्धन में फँसता जायगा। यह तत्त्वज्ञान का अभाव भी कृष्ण- भावना से दूर हो सकता है, जैसा पद्मपुराण से प्रमाणित है: “कृष्ण- भावनाभावित शुद्धभक्ति वह परमोच्च आलोक है, जो वासनारूप अमंगलकारी सर्पों के लिए दावानल जैसा है। वन में आग लगने पर वहाँ रहने वाले सब सर्प देखते-देखते समाप्त हो जाते हैं। अन्य पशु तो भाग कर प्राणरक्षा कर लेते हैं, परन्तु सर्प तत्काल भस्म हो जाते हैं। इसी प्रकार, कृष्णभावना रूपी प्रज्ज्वलित अग्नि इतनी प्रबल है कि उसके आगे अविद्या रूप सर्प तुरन्त मर जाते हैं।