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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १३ कृष्णभावना सर्व शुभदा है श्रील रूप गोस्वामीपाद ने कृष्णभावना के शुभदत्व का विवेचन किया है। वे कहते हैं कि यथार्थ शुभ सम्पूर्ण जगत् का कल्याण-कार्य करने में है। आज नाना जनसमूह समाज, जाति और राष्ट्र आदि के कल्याण- कार्य में तत्पर हैं। संयुक्त राष्ट्र के रूप में विश्व-हितक्रिया की दिशा में भी प्रयत्न चल रहा है। परन्तु संकीर्ण राष्ट्रीयता के दोषों के कारण सम्पूर्ण विश्व समाज के लिए कल्याण कार्य का व्यापक आयोजन व्यावहारिक रूप से सम्भव नहीं है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन इतना सर्वांग सुन्दर है कि यह सम्पूर्ण मानवसमाज का परम उपकार (कल्याण) कर सकता है। सभी इस आन्दोलन के प्रति आकृष्ट हो सकते हैं और इसके परिणाम का अनुभव कर सकते हैं। अतएव श्रील रूप गोस्वामीपाद और अन्य सब विद्वान् इस विषय में एकमत हैं कि कृष्णभावना आन्दोलन के द्वारा सम्पूर्ण जगत् में भक्तियोग का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना मानव- जाति का सर्वोत्तम परोपकार कार्य है। कृष्णभावना आन्दोलन सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकृष्ट कर सकता है और मनुष्यमात्र इस कृष्णभावना का आस्वादन कर सकता है, ये दोनों पद्मपुराण के इस वाक्य से सिद्ध हो जाते हैं: “जो पुरुष पूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित होकर भक्तियोग में तत्पर है, वह सम्पूर्ण जगत् की सर्वोत्तम सेवा करते हुए जगत् के सब प्राणियों को तृप्त कर लेता है। इतना ही नहीं, स्थावर-जंगम जन्तुओं तक का उसमें अनुराग हो जाता है, वे भी कृष्णभावना आन्दोलन की ओर आकृष्ट हो उठते हैं।” मध्यभारत के झारिखण्ड नामक अंचल में संकीर्तन-प्रचार के लिए जाते हुए श्रीमन्महा- प्रभु चैतन्यदेव ने इसका प्रत्यक्ष उदाहरण उपस्थित किया है। उन्हें देखकर शेर, हाथी, मृग आदि पशु भी अपनी रीति से हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करते हुए झूमझूम कर नाचने लगे थे। इसके अतिरिक्त, भक्तियोग में तत्पर कृष्णभावनाभावित पुरुष में देवताओं के सारे गुण विकसित हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत (५.१८.१२) में शुकदेव गोस्वामी ने कहा है, “हे राजन् ! श्रीकृष्ण के निष्किंचन निश्छल भक्त में सब दैवी गुण पाये जाते हैं। भक्त की विकसित कृष्णभावना के कारण देवता भी उसके संग में निवास करना चाहते हैं, अतः उसके देह में सभी दैवी गुणों का विकास रहता है।” दूसरी ओर, जो कृष्णभावनाभावित नहीं है, उसमें कोई सद्गुण नहीं होता। संसार की दृष्टि से वह बड़ा विद्वान् हो सकता है, परन्तु अपनी