भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु वास्तविक क्रियाओं में तो वह पशुओं से भी अधम दिखता है। यदि कोई विद्वान् कहलानेवाला मानसिक स्तर से ऊपर नहीं उठ सकता, तो यह निश्चित है कि उससे केवल प्राकृत कर्म ही बनेंगे; इस प्रकार वह सदा अशुद्ध रहेगा। आधुनिक जगत् में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जिन्होंने जड विद्या के विश्वविद्यालयों में गम्भीर अध्ययन किया है; पर फिर भी वे कृष्ण- भावना आन्दोलन को अंगीकार नहीं कर सकते । इसलिए उनमें सद्गुणों का विकास नहीं हो सकता । विश्वविद्यालय की दृष्टि के अनुसार सुशिक्षित न होने पर भी कृष्ण- भावनाभावित बालक परस्त्रीगमन, द्युत, मांसाहार और मद्यपान, आदि कुकर्मों को तत्काल त्याग सकता है। दूसरी ओर, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं, वे उच्च शिक्षा-प्राप्त होने पर भी प्रायः मद्यप, मांसाहारी, लम्पट और द्युत-परायण पाये जाते हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि एक कृष्णभावनाभावित पुरुष में सद्गुणों का बहुत अधिक विकास हो जाता है, जबकि कृष्णभावनाविरहित ऐसा नहीं कर सकता। हमारा अनुभव है कि कृष्णभावनाभावित नवयुवक भी चलचित्र, नाईट क्लब, नग्न नृत्य, होटल, मद्यशाला आदि में रुचि नहीं रखता। वह इन सभी अनर्थों से मुक्त हो जाता है और इस प्रकार अपने अमूल्य समय को धूम्रपान, मद्य- पान, थेटर, नृत्य आदि में अपव्यय होने से बचाता है। जो कृष्णभावना में नहीं है, वह आधे घण्टे भी एकाग्र होकर चुप- चाप नहीं बैठ सकता । आजकल प्रचलित योग-पद्धति सिखाती है कि चुप बैठे रहने से साधक को यह अनुभूति हो जायगी कि वह ईश्वर है । यह पद्धति विषयी व्यक्तियों की समझ से उपयुक्त हो सकती है, परन्तु यह भी सोचना चाहिए कि कितने समय तक वे चुप रह सकेंगे ? कोई कृत्रिम रूप से मिथ्या ध्यान के लिए बैठ भी जाय, पर यौगिक अभ्यास के तत्काल बाद फिर परस्त्रीगमन, मद्यपान, द्युत, मांसाहार, आदि अनर्थों में प्रवृत्त हो जायगा । कृष्णभावनाभावित पुरुष इस कपट-ध्यान के लिए आयास किए बिना ही शनैः-शनैः आत्मोन्नति करता जाता है। कृष्णभावना-परायण होने के कारण वह अनायास इन सब अनर्थों को त्याग कर सच्चरित्र का विकास कर लेता है। सच्चरित्र का विकास श्रीकृष्ण का शुद्धभक्त बनने पर ही होता है। निष्कर्ष यह है कि जिसमें कृष्णभावना का अभाव है, उसमें कोई भी यथार्थ सद्गुण नहीं हो सकता । कृष्णभावना का सुख श्रील रूप गोस्वामी ने सुख को तीन कोटियों में बाँटा है। उनके