भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
१४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु वास्तविक क्रियाओं में तो वह पशुओं से भी अधम दिखता है। यदि कोई विद्वान् कहलानेवाला मानसिक स्तर से ऊपर नहीं उठ सकता, तो यह निश्चित है कि उससे केवल प्राकृत कर्म ही बनेंगे; इस प्रकार वह सदा अशुद्ध रहेगा। आधुनिक जगत् में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जिन्होंने जड विद्या के विश्वविद्यालयों में गम्भीर अध्ययन किया है; पर फिर भी वे कृष्ण- भावना आन्दोलन को अंगीकार नहीं कर सकते । इसलिए उनमें सद्गुणों का विकास नहीं हो सकता । विश्वविद्यालय की दृष्टि के अनुसार सुशिक्षित न होने पर भी कृष्ण- भावनाभावित बालक परस्त्रीगमन, द्युत, मांसाहार और मद्यपान, आदि कुकर्मों को तत्काल त्याग सकता है। दूसरी ओर, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं, वे उच्च शिक्षा-प्राप्त होने पर भी प्रायः मद्यप, मांसाहारी, लम्पट और द्युत-परायण पाये जाते हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि एक कृष्णभावनाभावित पुरुष में सद्गुणों का बहुत अधिक विकास हो जाता है, जबकि कृष्णभावनाविरहित ऐसा नहीं कर सकता। हमारा अनुभव है कि कृष्णभावनाभावित नवयुवक भी चलचित्र, नाईट क्लब, नग्न नृत्य, होटल, मद्यशाला आदि में रुचि नहीं रखता। वह इन सभी अनर्थों से मुक्त हो जाता है और इस प्रकार अपने अमूल्य समय को धूम्रपान, मद्य- पान, थेटर, नृत्य आदि में अपव्यय होने से बचाता है। जो कृष्णभावना में नहीं है, वह आधे घण्टे भी एकाग्र होकर चुप- चाप नहीं बैठ सकता । आजकल प्रचलित योग-पद्धति सिखाती है कि चुप बैठे रहने से साधक को यह अनुभूति हो जायगी कि वह ईश्वर है । यह पद्धति विषयी व्यक्तियों की समझ से उपयुक्त हो सकती है, परन्तु यह भी सोचना चाहिए कि कितने समय तक वे चुप रह सकेंगे ? कोई कृत्रिम रूप से मिथ्या ध्यान के लिए बैठ भी जाय, पर यौगिक अभ्यास के तत्काल बाद फिर परस्त्रीगमन, मद्यपान, द्युत, मांसाहार, आदि अनर्थों में प्रवृत्त हो जायगा । कृष्णभावनाभावित पुरुष इस कपट-ध्यान के लिए आयास किए बिना ही शनैः-शनैः आत्मोन्नति करता जाता है। कृष्णभावना-परायण होने के कारण वह अनायास इन सब अनर्थों को त्याग कर सच्चरित्र का विकास कर लेता है। सच्चरित्र का विकास श्रीकृष्ण का शुद्धभक्त बनने पर ही होता है। निष्कर्ष यह है कि जिसमें कृष्णभावना का अभाव है, उसमें कोई भी यथार्थ सद्गुण नहीं हो सकता । कृष्णभावना का सुख श्रील रूप गोस्वामी ने सुख को तीन कोटियों में बाँटा है। उनके
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १५ अनुसार सुख के तीन भेद ये हैं : १. विषयों का सुख २. परब्रह्म से अपने को एक मानने का सुख तथा ३. कृष्णभावना से प्राप्त होने वाला सुख । 'तन्त्रशास्त्र' में शिवजी सती से कहते हैं, “हे साध्वि ! जिसने भगवान् गोविन्द के चरणों में शरणागत होकर शुद्ध कृष्णभावना का विकास कर लिया है, वह बड़ी सुगमता से निर्विशेषवादियों द्वारा अभिलाषित सभी सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है; इसके अतिरिक्त, वह शुद्धभक्तों को मिलने वाले परमानन्द का आस्वादन कर सकता है ।” शुद्ध भक्तियोग का सुख परमोच्च है, क्योंकि वह शाश्वत् है । प्राकृत सिद्धियों अथवा ब्रह्मैक्य से होने वाला सुख क्षणभंगुर होने के कारण तुच्छ है । प्राकृत सुख से पतन का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, यहाँ तक कि निर्विशेष ब्रह्म के सायुज्य से प्राप्त अप्राकृत सुख तक से गिरने की पूरी सम्भावना रहती है । देखा जाता है कि परम विद्वान् और लगभग तत्त्व-साक्षात्कार के स्तर पर पहुँचे हुए मायावादी संन्यासी भी कभी-कभी राजनीतिक अथवा सामाजिक परोपकार-कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं । इसका कारण यह है कि निर्विशेष के ज्ञान में उन्हें कोई आत्यन्तिक सुख नहीं मिलता; इसीलिए वे बाध्य होकर प्राकृत स्तर पर उतर आते हैं और एक बार फिर प्रापंचिक कार्यों में फँस जाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। परन्तु पूर्णतया कृष्ण- भावनाभावित पुरुष किसी भी प्रकार के प्राकृत स्तर पर फिर कभी नहीं उतरता । वे चाहे कितने भी मोहक और आकर्षक क्यों न हों, वह भली भाँति जानता है कि कोई प्राकृत परोपकार कार्य कृष्णभावना के दिव्य कर्मों की तुलना नहीं कर सकता । यथार्थ में सफल हुए योगियों को आठ प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं । पहली 'अणिमा' सिद्धि के द्वारा इतना सूक्ष्म बना जा सकता है कि पत्थर तक में प्रवेश किया जा सके । आधुनिक विज्ञान ने भी इस सिद्धि को प्राप्त किया है—उसके द्वारा भू-खनन किया जाता है । इसी प्रकार अन्य सभी सिद्धियाँ भी वस्तुतः प्राकृत कलायें हैं । उदाहरणार्थ, एक योगसिद्धि से मनुष्य इतना हल्का हो जाता है कि जल-वायु में तैर सकता है । आधुनिक वैज्ञानिकों को इसमें भी सफलता मिली है । वे वायुमण्डल में उड्डयन करते हैं, जल पर तैरते हैं और जल के नीचे यात्रा करते हैं । इन सब योगसिद्धियों की प्राकृत उपलब्धियों से तुलना करने पर
१६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु स्पष्ट है कि वास्तव में प्राकृत वैज्ञानिक भी इन्हीं सिद्धियों के लिए यत्न- शील हैं। अतः प्राकृत-सिद्धि और योगसिद्धि में वस्तुत कोई अन्तर नहीं है। एक जर्मन मनीषी ने एक बार कहा था कि तथाकथित योगसिद्धियों को आधुनिक वैज्ञानिकों ने पहले ही प्राप्त कर लिया है, इसलिए उसकी उसमें कोई रुचि नहीं है। वह बुद्धिमानी से भारत आया और भक्तियोग के द्वारा भगवान् से अपने नित्य सम्बन्ध को जाना। निस्सन्देह, योगसिद्धि की श्रेणी में कुछ ऐसी पद्धतियाँ भी हैं, जिन्हें आधुनिक वैज्ञानिक अभी तक विकसित नहीं कर सके हैं। जैसे, योगी सूर्य- किरणों के द्वारा सूर्य में प्रविष्ट हो सकता है। इस सिद्धि को 'लघिमा' कहते हैं। ऐसे ही, योगी अपने हाथ से चन्द्रमा आदि नक्षत्रों को छू सकता है। आधुनिक अन्तरिक्षयात्रियों को चन्द्रमा तक जाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि सिद्ध योगी केवल हाथ आगे बढ़ाकर अंगुली से चन्द्रमा का स्पर्श कर सकता है। यह 'प्राप्ति' सिद्धि है। इस शक्ति से युक्त योगी कहीं भी हाथ बढ़ाकर किसी भी अभिलाषित वस्तु को प्राप्त कर सकता है। किसी स्थान से चाहे वह हजारों मील दूर बैठा हो, परन्तु यदि चाहे तो वहाँ पर स्थित उद्यान के फल खा सकता है। इसी का नाम 'प्राप्ति' है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने परमाणु अस्त्रों का निर्माण कर लिया है, जो इस लोक के एक नगण्य भाग को नष्ट कर सकते हैं; परन्तु 'ईशिता' नाम योग-सिद्धि द्वारा संकल्प मात्र से किसी भी लोक का सृजनसंहार किया जा सकता है। एक अन्य 'वशिता' सिद्धि है, जिससे किसी को भी अपने वश में कर सकते हैं। यह एक दुर्धर वशीकरण सी है। कभी-कभी देखा जाता है कि इस वशिता शक्ति की आंशिक सिद्धि वाला योगी जन- साधारण में आकर सब प्रकार का अनर्गल बोलता है, जनता के मन को वश में करके धन अपहरण करता है और फिर भाग जाता है। एक 'प्राकाम्य' नामक सिद्धि भी होती है। इसके द्वारा मन की कोई भी कामना पूरी की जा सकती है। जैसे, नेत्र में जल को प्रवेश कराकर फिर वापस निकालना योगी संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे अद्भुत कार्य कर सकता है। योगशक्ति की सर्वोच्च सिद्धि 'कामावसायिता' कहलाती है। प्राकाम्य शक्ति से जहाँ प्रकृति के अन्तर्गत ही अद्भुत कार्य हो सकते हैं; इस शक्ति से प्रकृति-विरुद्ध अर्थात् असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। योग की इन सब प्राकृत सिद्धियों के द्वारा विशाल क्षणिक सुख उपलब्ध हो सकता है।
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १७ आधुनिक प्राकृत उन्नति की चकाचौंध से मोहित लोग मूर्खतापूर्वक समझते हैं कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन मन्दों के लिए है। वे सोचते हैं, "विषय साधनों वाला मैं इन से श्रेष्ठ हूँ; मुझे सुन्दर आवास, परिवार और मैथुन का सुख प्राप्त है।" वे नहीं जानते कि किसी भी क्षण वे अपनी प्राकृत स्थिति से बाहर फेंके जा सकते हैं। अज्ञानवश उन्हें पता नहीं कि यथार्थ जीवन नित्य है। शरीर के तात्कालिक सुख जीवन के लक्ष्य नहीं हैं; अज्ञानरूपी घोर अन्धकार के कारण ही लोग प्राकृत सुखों की उन्नति की चकाचौंध पर मोहित हो रहे हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि प्राकृत विद्या की उन्नति मनुष्य को उत्तरोत्तर अधिक मूढ कर देती है, क्योंकि उसकी चकाचौंध से वह अपना यथार्थ स्वरूप भुला बैठा है। यह उसका नाश है; कारण, मनुष्यजीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राकृत बन्धन से छूटना है। प्राकृत जड विद्या के विकास से लोग भवबन्धन में दिन-पर-दिन और पड़ते जा रहे हैं। उनके लिए इस महाविनाश से उद्धार की कोई आशा नहीं। 'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज भगवान् नृसिंह से प्रार्थना करते हैं, "देव ! आपके चरणारविन्द में मेरा बारम्बार यही निवेदन है कि आपमें मेरी दृढ़ अनन्य भक्ति हो। बस, यही इच्छा है कि मेरी कृष्णभावना में स्थिर निष्ठा हो, क्योंकि कृष्णभावना और भक्तियोग का मुख इतना प्रबल होता है कि उसके साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि सब सिद्धियाँ अपने-आप सुलभ हो जाती हैं।" वास्तव में शुद्धभक्त इनमें से किसी सिद्धि की अभिलाषा नहीं रखता, क्योंकि कृष्णभावनाभावित भक्तियोग का सुख इतना दिव्य और अपरिमेय हुआ करता है कि किसी अन्य सुख की उससे तुलना नहीं हो सकती। सिद्धान्त है कि किसी भी अन्य क्रिया से मिलने वाले सुख का सागर तक कृष्णभावना के सुख के एक बिन्दु के समान भी नहीं हो सकता। अतएव जिस मनुष्य ने थोड़ा भी शुद्ध भक्तियोग का विकास कर लिया हो, वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से मिलने वाले अन्य सब प्रकार के सुख को सहज में तिलांजलि दे सकता है। खोलवेचा श्रीधर नामक श्रीचैतन्य महाप्रभु का एक परम भक्त था। वह अत्यन्त अकिंचन था। वह केले के पत्ते बेचा करता था, जिससे उसकी नगण्य सी आय थी। ऐसी स्थिति में भी वह अपनी आय का आधा भाग गंगा-पूजन पर व्यय करता और शेष अंश से जैसे-तैसे काम चलाता।
१८] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीचैतन्य महाप्रभु ने एक समय इस अंतरंग भक्त को अपना साक्षात्कार कराया था और उससे किसी इच्छित ऐश्वर्य को माँग लेने को कहा था । परन्तु श्रीधर ने श्रीमन्महाप्रभु से निवेदन किया कि वह किसी प्राकृत ऐश्वर्य की इच्छा नहीं रखता । उसे अपनी स्थिति में पूर्ण सुख था; वह बस इतना चाहता था कि श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में उसकी अनन्य निष्ठा और भक्ति हो । यह शुद्धभक्तों की स्थिति है । यदि वे निरन्तर दिन में चौबीस घण्टे भक्तियोग में तत्पर रह सकें, तो फिर उन्हें और कुछ नहीं चाहिए । उन्हें तो मुक्ति अथवा ब्रह्मैक्य के सुख की इच्छा तक नहीं होती । 'नारदपंचरात्र' में कहा है कि जिसमें भक्ति का कुछ भी विकास हुआ हो, वह पुरुष धर्म, अर्थ, काम अथवा पाँच प्रकार की मुक्ति से होने वाले सुख को बिलकुल तुच्छ समझता है । शुद्धभक्त के हृदय में ऐसा कोई सुख प्रवेश तक नहीं कर सकता । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सुख तो दासियों के समान अभिवादन करते हुए भक्ति रूप महारानी के पीछे-पीछे चला करते हैं । भाव यह है कि शुद्धभक्त को किसी भी स्रोत से मिलने वाले सुख का अभाव नहीं रहता । उसे कृष्णसेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए । परन्तु यदि वह कोई अन्य इच्छा करे भी, तो उसके माँगे बिना ही भगवान् उसे पूरा कर देते हैं । शुद्धभक्ति की सुदुर्लभता परमार्थ की प्रारंभिक दशा में स्वरूप-साक्षात्कार के लिए नाना प्रकार के तप, त्याग आदि साधनों का विधान है। यदि कोई साधक विषय-वासना से रहित हो, तो भी भक्तियोग की प्राप्ति दुर्लभ है। स्वयं साधन करने पर अधिक आशा नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण जिस किसी को भक्ति का दान नहीं देते । श्रीकृष्ण प्राकृत सुख अथवा मुक्ति तो दे सकते हैं, पर इतनी सरलता से किसी को भक्तियोग में नहीं लगाते । वास्तव में भक्तियोग की प्राप्ति शुद्धभक्त की कृपा से ही होती है । चैतन्य- चरितामृत (मध्य १६.१५१) में कहा है, "श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त—गुरुदेव और स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा से ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । भक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है ।" भक्ति की दुर्लभता को 'तन्त्रशास्त्र' ने भी स्वीकार किया है। शिवजी सती से कहते हैं : "हे साध्वि ! तत्त्वज्ञानी को भवबन्धन से मुक्ति मिल सकती है और वैदिक यज्ञादि के पुण्यफल से पूर्ण विषय सुख हो
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १६ सकता है; परन्तु हजारों जन्मों तक यत्न करने पर भी इन साधनों से भक्ति दुर्लभ ही रहती है ।" श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद महाराज का वचन है कि केवल निजी प्रयास से अथवा अधिकारी पुरुषों के उपदेश से भक्तियोग की प्राप्ति नहीं हुआ करती । इसके लिए विषयवासना से रहित शुद्धभक्त के चरणार- विन्द का रजप्रसाद चाहिए । श्रीमद्भागवत (५.६.१८) में नारदजी युधिष्ठिर से कहते हैं, "हे राजन् ! भगवान् मुकुन्द (श्रीकृष्ण) ही पाण्डवों और यादवों के शाश्वत् स्वामी (रक्षक) हैं। वे तुम्हारे गुरु, सर्वविध शिक्षक, आराध्य देव हैं, इष्ट और प्रेमास्पद हैं तथा सब प्रकार से कुलपति हैं। अधिक क्या, कभी-कभी तो वे सेवक की भाँति तुम्हारी आज्ञा-पालन तक करते हैं। राजन् ! तुम कितने भाग्यवान हो ! तुम पर भगवान् श्रीकृष्ण के इस कृपाप्रसाद की दूसरे तो कल्पना भी नहीं कर सकते ।" इस श्लोक का भाव यह है कि भगवान् मुक्ति सुगमता से दे देते हैं, परन्तु भक्तियोग किसी दुर्लभ जीव को ही देते हैं। कारण यह है कि भक्तियोग से भगवान् स्वयं भक्त के क्रीतदास हो जाते हैं । भक्ति का सान्द्रानन्द स्वरूप श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यदि ब्रह्मानन्द को करोड़ों गुणा कर दिया जाय, तो भी भक्तिसुख के सागर के एक परमाणु की भी बरा- बरी वह नहीं कर सकता । हरिभक्तिसुधोदय में प्रह्लाद महाराज भगवान् नृसिंह को अपनी प्रार्थना से प्रसन्न करते हुए कहते हैं, "हे जगद्गुरु भगवन् ! आपके साक्षात्कार के विशुद्ध सुखरूप सिन्धु में मग्न हुए मुझ को इस सुख की तुलना में ब्रह्मानन्द गौ के खुर जैसा अत्यन्त तुच्छ लगता है ।" इसी प्रकार श्रीधर स्वामी द्वारा विरचित श्रीमद्भागवत की 'भावार्थदीपिका' टीका में प्रमाणित है, "भगवन् ! आपके भक्तिरसामृतरूप सागर में विहरण करते हुए आपके कथामृत का आस्वादन करने वाले परमानन्दमग्न कोई- कोई भाग्यवान् भक्तजन भक्तियोग के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सुख को तृण के समान समझते हैं ।" श्रीकृष्णाकर्षिणी श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि भक्ति श्रीकृष्ण को भी आकर्षित कर लेती है। श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं; परन्तु भक्ति श्रीकृष्ण आकर्षिणी है। भक्ति
२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु के लक्षणों की चरम मूर्ति श्रीमती राधारानी हैं। श्रीकृष्ण को मदनमोहन कहा जाता है, वे कोटि-कोटि कंदर्प-दर्प-दलन हैं। परन्तु राधारानी तो और भी अधिक आकर्षक हैं, यहाँ तक कि वे श्रीकृष्ण तक को आकृष्ट कर लेती हैं। अतः भक्तजन उन्हें मदनमोहनमोहनी कहते हैं। भक्ति का आचरण करने का अर्थ राधारानी के चरणचिन्हों का अनुसरण करना है। इसीलिए वृन्दावन में भक्तजन राधारानी का आश्रय लेते हैं, जिससे उनकी भक्ति सिद्ध हो जाय । कहने का भाव यह है कि भक्ति प्राकृत-जगत् की क्रिया नहीं है; वह तो प्रत्यक्ष रूप से राधारानी के नियंत्रण में आती है। भगवद्गीता में प्रमाण है कि महात्मा पुरुष दैवी प्रकृति-राधारानी के आश्रित हैं। अतः साक्षात् श्रीकृष्ण की अंतरंगा शक्ति द्वारा संचालित होने के कारण भक्ति स्वयं श्रीकृष्ण को भी अपने वश में कर लेती है। श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीमद्भागवत (११.१४.२०) में इस सत्य को स्वीकार किया है "हे उद्धव ! भक्तों की प्रबल भक्ति मुझे जिस प्रकार आकर्षित कर सकती है, वैसे योग, सांख्य, धर्म, वेदान्त स्वाध्याय, तप, त्याग, दान, आदि पुण्यकर्म नहीं कर सकते ।" भक्तों की भक्ति के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के आकृष्ट होने का वर्णन श्रीमद्भागवत (७.१०.४३-४४) में नारदजी ने किया है। राजा युधिष्ठिर प्रह्लाद महाराज का गुणगान कर रहे थे, उस समय नारदजी ने उन्हें सम्बोधित किया। सच्चा भक्त सदा दूसरे भक्तों की क्रियाओं का महिमागान करता है। युधिष्ठिर महाराज प्रह्लाद जी का गुणगान कर रहे थे, जो शुद्धभक्त का लक्षण है। शुद्धभक्त अपने को कभी महान् नहीं समझता। वह तो निरन्तर दूसरे-दूसरे भक्तों को ही अपने से श्रेष्ठ मानता है। राजा सोच रहे थे, "प्रह्लाद महाराज भगवान् के यथार्थ भक्त हैं, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ।" ऐसे समय में नारदजी ने उनसे कहा, "युधिष्ठिर ! इस संसार में एकमात्र तुम पाण्डव ही भाग्यशाली हो, क्योंकि तुम्हारे घर में साक्षात् नराकृति परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं। वे औरों से बचते हैं, पर किसी भी परिस्थिति में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ते। जिन परमेश्वर को दूसरे नहीं जानते, वे ही तुम्हारे साथ भाई, मित्र और सेवक तक बन कर रह रहे हैं। निश्चय ही तुम से बढ़कर भाग्यवान् त्रिभुवन में नहीं है।" भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा अपना विश्वरूप प्रकट करने पर अर्जुन बोला, "हे कृष्ण, आपको अपना सखा मान कर मैंने "हे कृष्ण ! हे सखे !"-इस प्रकार पुकार कर आपका बहुत प्रकार से अपमान किया।
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ २१ परन्तु आप इतने महान् हैं, यह मैं नहीं जान सका ।'' अस्तु, पाण्डवों को ऐसी दुर्लभ स्थिति प्राप्त थी। यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् और देवाधि- देव हैं, फिर भी वे इन पाण्डवों की भक्ति, सख्य और प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ रहे। यह भक्तियोग की अगाध महिमा को सिद्ध करता है। वह भगवान् को भी वश में कर सकती है। भगवान् महान् हैं; पर भक्ति की महिमा उससे भी बढ़कर है, क्योंकि वह उन्हें भी आकर्षित कर लेती है। जो लोग भक्तियोग में नहीं हैं, वे यह कभी नहीं समझ सकते कि भगवत्सेवा की कितनी अतुल महिमा-गरिमा है।
अध्याय २ साधनभक्ति श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृतसिन्धु में भक्ति की तीन श्रेणियों का वर्णन किया है—साधनभक्ति, भावभक्ति तथा प्रेमाभक्ति। इनमें से प्रत्येक के अनेक उपभेद हैं। सामान्यतः साधनभक्ति में दो विशेषतायें हैं। भावभक्ति में चार विशेषतायें हैं तथा प्रेमाभक्ति में छः विशेषतायें हैं। श्रील रूप गोस्वामी क्रमशः इन सब का विवेचन करेंगे। इस सन्दर्भ में रूप गोस्वामी कहते हैं कि कृष्णभावना अथवा भक्ति- योग के पात्रों का उनकी अपनी-अपनी रुचि के अनुसार वर्गीकरण किया जा सकता है। उनका कथन है कि भक्ति का साधन पूर्वजन्म से आनुपूर्वी रूप में निरन्तर चला आता है। भक्ति से कुछ न कुछ पूर्व-सम्बन्ध के बिना कोई भी मनुष्य भक्तिमार्ग में प्रवेश नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ, कोई इस जीवन में भक्ति का थोड़ा सा साधन करता है। उसका साधन पूर्ण चाहे न हो, परन्तु जितना साधन किया है, वह नष्ट नहीं होगा। अगले जन्म में वह इससे आगे साधन में लग जायगा। इस प्रकार भक्ति का साधन निरन्तर चलता रहता है। परन्तु यदि ऐसा पूर्वक्रम न हो और कोई अकस्मात् शुद्धभक्त के उपदेश में रुचि लेने लगे तो उसे भी अंगीकार किया जा सकता है; वह भी भक्ति में उन्नति कर सकता है। चाहे जो हो, जिनकी भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को समझने में स्वाभाविक रुचि है, केवल मनोधर्म और तर्क के परायण रहनेवालों की तुलना में उनके लिए भक्तियोग सुगम है। इस कथन के समर्थन में प्राचीन विद्वानों के बहुत से प्रमाण हैं। उनके सामान्य मत के अनुसार, चतुर तार्किक जिस सिद्धान्त को यत्नपूर्वक सिद्ध करते हैं, उसे उनसे प्रबल तार्किक अपनी युक्ति के बल पर काटकर अन्यथा सिद्ध कर देते हैं। इस प्रकार तर्क के पद की कुछ भी प्रतिष्ठा नहीं है। अतएव श्रीमद्भागवत आचार्यों का अनुगमन करने को कहती है।
साधनभक्ति [ २३ यहाँ श्रील रूप गोस्वामी द्वारा भक्तियोग का सामान्य वर्णन हुआ है। पूर्व में, भक्ति की साधनरूपा, भावरूपा और प्रेमरूपा, इन तीन श्रेणियों का उल्लेख है। अब श्रील रूप गोस्वामी साधनभक्ति का विवेचन करते हैं। साधन का अर्थ किसी कार्य-विशेष में इन्द्रियों को लगाना होता है। अतः साधनभक्ति का अर्थ है अपनी सब इन्द्रियों से श्रीकृष्ण की सेवा करना। कुछ इन्द्रियाँ ज्ञान-अर्जन के लिए हैं तो कुछ संकल्प, संवेदन और विचार को कार्यरूप देने के लिए हैं। इस प्रकार साधन का अभिप्राय मन और इन्द्रियों को भक्तियोग के आचरण में लगाना हुआ। यह साधन किसी अस्वाभाविक (कृत्रिम) गुण को विकसित करने के लिए नहीं है। जैसे, कोई बालक चलना सीखता है। यह चलना अस्वाभाविक नहीं है। चलने की योग्यता मूल रूप में बालक में होती है; इसलिए केवल थोड़े साधन से वह भली प्रकार चलने लगता है। इसी भाँति, भगवद्भक्ति जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। आदिवासी जैसे असभ्य मनुष्य तक प्रकृति के नियम से घटने वाली किसी अद्भुत घटना के प्रति नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते; वे तब यह समझते हैं कि इस अद्भुत घटना अथवा कार्य के पीछे किसी दैवी सत्ता का हाथ अवश्य है। अतएव यह भावना जीव मात्र में है, चाहे बद्धावस्था में सुप्त रूप में हो क्यों न रहे। प्राकृत दोषों के आवरण से शुद्ध हो जाने पर यह कृष्णभावना कहलाती है। ऐसे विधि-विधान हैं, जिनसे हम अपनी इन्द्रियों और मन को इस प्रकार लगा सकते हैं कि हमारा सोया हुआ कृष्णप्रेम जागृत हो जाय, ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़े अभ्यास से बच्चा चलने लगता है। जिसमें चलने की मूल क्षमता नहीं है, वह कितना भी अभ्यास क्यों न करे, पर चल नहीं सकता। कृष्णभावना को किसी भी साधन से सिद्ध नहीं किया जा सकता। वास्तव में ऐसा कोई साधन नहीं है। वह तो नित्यसिद्ध है। परन्तु जब जीव भक्ति को, जो उसका आन्तरिक गुण है, विकसित करना चाहे, तो ऐसे कुछ साधन हैं जिनका आचरण करने से वह सोया हुआ गुण जागृत हो जायगा। इसी अभ्यास का नाम साधनभक्ति है। मायाशक्ति के वशीभूत हुआ जीव अस्वाभाविक प्रमत्त दशा में है। श्रीमद्भागवत में कहा है, "सामान्यतः बद्धजीव उन्मत्त रहता है क्योंकि वह निरन्तर उन्हीं क्रियाओं में तत्पर है, जो बन्धन और दुःख का कारण बनती हैं।" मूल रूप में आत्मा सच्चिदानन्दमय है। प्राकृत क्रियाओं में पड़ जाने के कारण ही वह दुःखी, क्षणिक और पूर्ण रूप से अज्ञानी हो गया
२४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। यह 'विकर्म' का फल है। 'विकर्म' उस कर्म को कहते हैं, जिसे नहीं करना चाहिए। इसके उपचाररूप में साधनभक्ति का आचरण करना है। इस अभ्यास के मुख्य अंग ये हैं—प्रातः काल मंगल-आरती (अर्चन) करना, कुछ प्राकृत क्रियाओं से बचना, गुरुवन्दन आदि। अन्य बहुत से विधि- विधानों का पालन भी करना है, जिनका वर्णन आगे क्रमानुसार किया जायगा। इन साधनों से उन्माद दूर करने में सहायता मिलेगी। वैद्य मनुष्य के मस्तिष्करोग को दूर करता है और यह साधनभक्ति माया के कारण बद्धजीव की उन्मत्तता को मिटा देती है। नारद मुनि ने इस साधनभक्ति का उल्लेख श्रीमद्भागवत (७.१.३२) में किया है। वे महाराज युधिष्ठिर से कहते हैं, "हे राजन् ! जिस किसी उपाय से मन को श्रीकृष्ण में लगाना है।" इसी का नाम कृष्णभावनामृत है। आचार्य का कर्तव्य है कि ऐसे उपाय करें जिससे शिष्य का चित्त श्रीकृष्ण में एकाग्र हो जाय। यही साधनभक्ति का उपक्रम है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस उद्देश्य से हमें एक प्रामाणिक कार्यक्रम दिया है, जो हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन पर आधारित है। यह कीर्तन इतना दिव्य शक्तिसम्पन्न है कि इसके साधन से श्रीकृष्ण में तत्काल आसक्ति हो जाती है। इससे 'साधनभक्ति' का सूत्रपात होता है। जिस किसी प्रकार मन को श्रीकृष्ण में निवेशित करना है। सन्तप्रवर अम्बरीष महाराज ने राज्य का दायित्व होते हुए भी अपने मन को श्रीकृष्ण में लगा रखा था। इस प्रकार जो कोई अपने मन को एकाग्र करने का साधन करेगा, वह अपनी स्वरूपभूत कृष्णभावना का पुनर्जागरण करने में बहुत शीघ्र सफल होगा। इस साधनभक्ति का भी दो भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है। पहली, 'वैधी' नामक साधनभक्ति में गुरु-आज्ञा अथवा शास्त्रप्रमाण के आधार पर विविध विधानों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें तर्क अथवा प्रमाद का प्रश्न ही नहीं बनता, विधि का पालन आवश्यक कर्तव्य है। दूसरी, 'रागानुगा' साधनभक्ति की प्राप्ति तब होती है जब साधक विधि का पालन करता हुआ श्रीकृष्ण में अधिक अनुरक्त हो जाता है और सहज प्रेमवश भक्ति करने लगता है। जैसे किसी साधक-भक्त को प्रातः काल मंगल आरती के समय उठने का आदेश दिया जाय। प्रारम्भ में वह गुरु-आज्ञा के अनुसार प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर आरती करता है, पर कालान्तर में उसका इस कार्य में यथार्थ अनुराग हो जाता है। इस आसक्ति का उदय होने पर वह स्वतः मूर्ति का शृंगार करने लगता है,
नाना प्रकार के वस्त्रालंकार बनाता है और भक्ति का सर्वांग सुन्दर आचरण करने के लिए अनेक संकल्प करता है। साधनभक्ति की श्रेणी में होते हुए भी यह प्रेममयी सेवा रागानुगा है। अस्तु, साधनभक्ति की वैधी और रागानुगा—दो श्रेणियां सिद्ध हुईं। रूप गोस्वामी ने 'वैधीभक्ति' की व्याख्या इस प्रकार की है : “जब राग अथवा रागानुगा भगवत्सेवा के बिना केवल और गुरु अथवा शास्त्र का आज्ञा के बल पर भगवत्सेवा में प्रवृत्ति होती है, उसे 'वैधीभक्ति' कहते हैं।” 'वैधीभक्ति' का श्रीमद्भागवत (२.१.५) में भी वर्णन है, जहाँ शुक- देव गोस्वामी मुमुर्षु महाराज परीक्षित का उनके योग्य आचरण का निर्देश किया है। महाराज परीक्षित की शुकदेव से भेंट मरने से केवल सात दिन पहले हुई। उस समय राजा अपने मरण-काल के कर्तव्य के विषय में बहुत चिन्तित थे। दूसरे-दूसरे कितने ही ऋषि वहाँ पधार चुके थे, पर कोई उन्हें उपयुक्त निर्देश नहीं दे सका। ऐसे में शुकदेव जी ने उन्हें आज्ञा दी— “हे राजन् ! यदि सात दिन बाद आने वाली भयावह मृत्यु का सामना तुम निर्भय होकर करना चाहते हो तो अविलम्ब भगवान् श्रीहरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करने लगो।” यदि कोई हरेकृष्ण महामन्त्र का श्रवण- कीर्तन करता हुआ भगवान् श्रीकृष्ण को निरन्तर स्मरण रखे तो मृत्यु कभी भी क्यों न आय, उसे कोई भय नहीं रहेगा। शुकदेव गोस्वामी के वाक्यों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, अतः नित्य उन्हीं में कथा का श्रवण करना चाहिए। शुकदेवजी ने देवताओं का श्रवण-कीर्तन करने को नहीं कहा है। मायावादियों का मत है कि किसी भी नाम का कीर्तन किया जा सकता है; वह नाम चाहे श्रीकृष्ण का हो अथवा किसी देवता का, दोनों का एक परिणाम होगा। परन्तु वास्तव में यह सत्य नहीं है। श्रीमद्भागवत के प्रमाण के अनुसार, केवल भगवान् विष्णु (कृष्ण) का ही श्रवण-कीर्तन करना है। शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को परामर्श दिया है कि मृत्युभय की निवृत्ति के लिए सब प्रकार से निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए। वे यह कहते हैं कि भगवान् 'सर्वात्मा' हैं, अर्थात् सबके परमात्मा हैं। श्रीकृष्ण को 'ईश्वर' भी कहा गया है; क्योंकि वे सबके अन्तर्यामी परम नियन्ता हैं। अतः यदि किसी प्रकार हम श्रीकृष्ण में आसक्त हो जायें तो वे हमें सब प्रकार के भय से मुक्त कर देंगे। भगवद्गीता में उल्लेख है कि भगवान् के भक्त का कभी नाश
२६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नहीं होता। पर दूसरों का अवश्य नाश होता है। नाश होता है, अर्थात् इस मनुष्ययोनी की प्राप्ति होने पर भी वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाते और इस प्रकार इस स्वर्ण अवसर को खो बैठते हैं। ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि प्रकृति के नियम उसे कहाँ फेंक रहे हैं। यदि कोई मनुष्य-योनि में अपनी कृष्णभावना को जागृत नहीं करता तो उसे ८४,००,००० योनियों में जन्म-मृत्यु के चक्र में फेंक दिया जायगा और उसका आत्मस्वरूप खोया रहेगा। जीव-योनियाँ अनेक हैं, कोई नहीं जानता कि वह आगे पौधा बनेगा, पशु अथवा, पक्षी या कुछ और। अपनी आद्यस्वरूपभूत कृष्णभावना को पुनः उद्भावित करने के लिए रूप गोस्वामी का परामर्श है कि किसी न किसी प्रकार हमें अपना मन दृढ़ता से श्रीकृष्ण में निवेशित कर देना चाहिए। ऐसा करके परिणाम में मृत्यु से निर्भय हो जायें। मरने के बाद हमारी गति क्या होगी, हमें पता नहीं, क्योंकि हम पूर्ण रूप से प्रकृति के नियमों के परवश हैं। एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण का प्रकृति पर नियन्त्रण है। इसलिए यदि हम निष्कपट भाव से श्रीकृष्ण का आश्रय ले लें तो नाना योनियों के चक्र में वापस फेंके जाने का भय न रहेगा। निष्छल भक्त निश्चित रूप से कृष्णलोक में प्रवेश करेगा, जैसा भगवद्गीता से प्रमाणित है। 'पद्मपुराण' में भी इसी पद्धति का विधान है। वहाँ कहा है कि निरन्तर भगवान् विष्णु का स्मरण करना चाहिए। श्रीकृष्ण के इस नित्य चिन्तन को 'ध्यान' कहते हैं। विधान है कि मन को विष्णु पर एकाग्र करके ध्यान करे। पद्मपुराण के अनुसार, ध्यान के द्वारा मन को श्रीविष्णु में निवेशित कर देना चाहिए, जिससे क्षणभर को भी उनका विस्मरण कभी न हो। चेतना की इसी अवस्था का नाम 'समाधि' है। अपने जीवन की क्रियाओं को इस प्रकार ढालने के लिए हमें सदा प्रयत्न करते रहना चाहिए, जिससे विष्णु (कृष्ण) का स्मरण निरन्तर रह सके। इसका नाम कृष्णभावनामृत है। ध्यान चाहे चतुर्भुज विष्णु का किया जाय, अथवा द्विभुज श्रीकृष्ण का, एक ही बात है। 'पद्मपुराण' कहता है कि जिस-किसी प्रकार सदा श्रीविष्णु का चिन्तन करे, किसी भी परिस्थिति में उनकी विस्मृति न हो। यह सम्पूर्ण विधानों में सबसे मूलभूत है। जब किसी कर्म का विधान किया जाता है, तो उसके साथ कुछ निषेध भी होते हैं। जब यह विधान किया गया है कि निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए तो यह निषेध भी समझना चाहिए कि उनकी
साधनभक्ति [२७ विस्मृति कभी न हो। इस सीधे से विधि-निषेध के अन्तर्गत सम्पूर्ण विधि- विधान आ जाते हैं। यह विधि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सब वर्ण-आश्रमों के लिए है। विधि-विधान केवल ब्रह्म- चारियों के लिए ही आचरणीय नहीं; वरन् सभी के लिए पालनीय हैं। इसमें यह नहीं देखा जाता कि कोई ब्रह्मचारी है या संन्यासी, उत्तम साधक है अथवा कनिष्ठ। श्रीभगवान् का निरन्तर स्मरण, एक क्षण के लिए भी उन्हें न भूलना- इस सिद्धान्त का अनुसरण सभी को अवश्य करना चाहिए। यदि इस विधान को माना जाये तो अन्य सब विधि-निषेधों का अपने-आप पालन हो जायगा, क्योंकि अन्य सब विधान इस प्रधान सिद्धान्त के सेवक हैं। विधि-विधान और उनके फल का श्रीमद्भागवत (११.५.२-३) में उल्लेख है। राजा निमि को उपदेश करने आए नौ योगेश्वरों में से चमस मुनि उन्हें सम्बोधित करते हुये कहते हैं, "हे राजन ! ब्राह्मण आदि चारों वर्ण श्रीभगवान् के विराट्रूप से प्रकट हुए । ब्राह्मण उनके मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य उरु से और शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए। इसी प्रकार संन्यासी मुख से, वानप्रस्थ बाहु से, गृहस्थ उरु से और ब्रह्मचारी चरणों से अलग- अलग उत्पन्न हुए।" इन वर्ण और आश्रमों का विभाजन गुणों के आधार पर है। भगवद्गीता में श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं कि उन्होंने चार-चार वर्ण आश्रमों की रचना मनुष्यों के निजी गुणों के आधार पर की है। जैसे एक ही शरीर के अलग अलग अंगों के भिन्न-भिन्न कार्य होते हैं, वैसे ही गुण और स्थिति के अनुरूप वर्ण और आश्रमों के अपने-अपने कर्तव्यकर्म हैं। परन्तु इन सभी कर्मों के लक्ष्य श्रीभगवान् हैं। जैसा भगवद्गीता में आया है, वे परम भोक्ता हैं। अतः चाहे कोई संन्यासी हो या शूद्र, अपने कर्मों से भगवान् को प्रसन्न करता है। श्रीमद्भागवत में भी इसका प्रमाण है- "सब को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। परन्तु कर्तव्य-कर्म की पूर्णता इसी में है कि इनसे भगवान् का सन्तोष हो।" इस प्रकार आज्ञा है कि अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार कर्म करता हुआ अपनी क्रियाओं से भगवान् को प्रसन्न करे। जो ऐसा नहीं करता, वह अपनी स्थिति से नीचे अधम योनियों में गिर जायगा। उदाहरणार्थ, भगवान् के मुख से उत्पन्न ब्राह्मण का कर्तव्य 'शब्दब्रह्म' का प्रचार करना है। ब्राह्मण मुख है, इसलिए उसे शब्दब्रह्म को प्रसारित करना है और भगवान् के लिए भोजन भी करना है। वैदिक विधान है कि
[२८] भक्तिरसामृतसिन्धु
जब ब्राह्मण भोजन करे तो समझना चाहिए कि उसके माध्यम से भगवान् खा रहे हैं। परन्तु यह नहीं कि ब्राह्मण भगवान् के लिए खाने के नाम पर केवल भोजन करता रहे और विश्वभर में भगवद्गीता के सन्देश का प्रसारण न करे। वास्तव में गीता का प्रचारक भगवान् श्रीकृष्ण का बड़ा प्रिय है; इसका प्रमाण स्वयं गीता में विद्यमान है। ऐसा प्रचारक ही यथार्थ ब्राह्मण है और उसे भोजन कराने से साक्षात् श्रीभगवान् तृप्त होते हैं। इसी प्रकार, क्षत्रिय का कर्तव्य माया के आक्रमण से जनता की रक्षा करना है। महाराज परीक्षित ने जैसे ही यह देखा कि एक शूद्र वर्ण का व्यक्ति गोवध करने को उद्यत है, तो तत्काल उन्होंने उस दुष्ट कलि को मारने के लिए खड्ग उठा ली। यह क्षत्रिय का प्रधान कर्तव्य है। रक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रत्यक्ष आज्ञा दी है कि जनसाधारण की रक्षा के लिए वह कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में हिंसा करे। वैश्यों का कार्य कृषि-पदार्थों का उत्पादन, क्रय-विक्रय और वितरण करना है। शूद्र वर्ग में वे आते हैं, जिनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की बुद्धि का अभाव है। इस श्रेणी के लोग शारीरिक श्रम के द्वारा तीनों उच्च जातियों की सहायता करते हैं। इस विधि से सब वर्णों में पूर्ण सहयोग रहता है और सब पारमार्थिक प्रगति करते हैं। उपरोक्त सहयोग के अभाव में समाज का पतन हो जायगा। इस कलह के युग—कलि में यही स्थिति है। कोई अपना कर्तव्य नहीं निभाता, फिर भी सब ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय होने का अभिमान करते हैं। परन्तु वास्तव में ऐसे मनुष्यों की कोई स्थिति नहीं है। वे श्रीभगवान् से बहिर्मुख हैं, क्योंकि वे कृष्णभावनाभावित नहीं हैं। ऐसे में इस कृष्णभावना आन्दोलन का उद्देश्य सम्पूर्ण मानवसमाज को सुव्यवस्थित करना है, जिससे सब सुखी हों और कृष्णभावना का विकास करके लाभ उठायें। भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव को उपदेश किया है कि वर्णाश्रम के विधान का पालन करने से भगवान् तृप्त होते हैं; परिणाम में सम्पूर्ण समाज को जीवन की सब आवश्यक वस्तुयें सुगमता से सुलभ हो जाती हैं यह इसलिए है क्योंकि वास्तव में तो श्रीभगवान् ही सब प्राणियों के भर्त्ता हैं। यदि सारा समाज अपने कर्तव्यपालन में कटिबद्ध और कृष्णभावना- भावित रहे, तो इसमें सन्देह नहीं कि उसके सारे सदस्य बड़े ही सुख- शान्ति से रह सकेंगे। जीवन की आवश्यकताओं से भरापूरा सारा जगत्
साधनभक्ति [ २६ वैकुण्ठ बन जायगा। भगवद्धाम में जाये बिना, केवल श्रीमद्भागवत का आज्ञापालन और कृष्णभावनाभावित कर्तव्यों का पालन करने से सारी मानवजाति सब प्रकार से सुखी हो जायगी। श्रीमद्भागवत (११.२७.४६) में ही एक अन्य वाक्य है, जिसमें श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे उद्धव ! सभी मनुष्य वैदिक-लौकिक क्रियाओं में लगे रहते हैं। यदि वे कृष्णभावनाभावित होकर इनमें से किसी भी प्रकार की क्रियाओं के फल से मेरी अर्चना करें, तो अपने-आप उनके लोक-परलोक दोनों सुखी हो जायेंगे, इसमें कुछ सन्देह नहीं।" श्रीकृष्ण के इस वाक्य से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कृष्णभावनाभावित क्रियाओं से सबकी सर्वाभीष्ट-सिद्धि होगी। इस प्रकार कृष्णभावनामृत आन्दोलन इतना उत्तम है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी—किसी भी उपाधि की आवश्यकता नहीं। मनुष्यमात्र जो कुछ कर रहा है, उसी में लगा रहकर अपनी कृष्णभावना- भावित क्रियाओं के फल से श्रीकृष्ण की आराधना करे। इससे सारी परि- स्थिति का समाधान हो जायगा और जगत् में सब सुख-शांति-लाभ करेंगे। 'नारदपंचरात्र' में भक्ति के इस विधि-विधान का वर्णन है : "शास्त्र में भगवान् की प्रसन्नता के लिए जो भी क्रियायें बताई गयी हैं, उसे संतपुरुष भक्ति की विधि मानते हैं। यदि कोई सद्गुरु के आश्रय में नियमित रूप से इस प्रकार भगवत्सेवा का आचरण करे तो शनैः-शनैः शुद्ध भगवत्प्रेममय सेवाभाव को प्राप्त हो जायगा।"
अध्याय ३ भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण पूर्णरूप से भगवद्भक्तिपरायण महात्माजनों के सत्संग के प्रभाव से किसी में श्रीकृष्ण के लिए किंचित् रुचि का उन्मेष हो सकता है। परन्तु साथ ही सकाम कर्मों और प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति बनी रह सकती है, जिस कारण नाना प्रकार का तप-त्याग करना अच्छा नहीं लगता। यदि ऐसे पुरुष की श्रीकृष्ण में अनन्य आसक्ति हो जाय तो वह भक्तियोग का अधिकारी बन जाता है। शुद्धभक्तों के सत्संग में कृष्णभावना की ओर ऐसा आकर्षण बड़े सौभाग्य का सूचक है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का प्रमाण है कि कोई भाग्य- वान् पुरुष ही सद्गुरु और श्रीकृष्ण की कृपा से भक्तिरूप लता के बीज को पाता है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (११.२०.८) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! दुर्लभ भाग्यवश ही कोई मुझमें आसक्त होता है। यदि वह सकाम कर्मों से पूर्णरूप से विरक्त न भी हो अथवा भक्ति में पूरा आसक्त न हुआ हो, तो भी मेरी सेवा शीघ्र प्रभाव दिखाती है।" भक्त तीन प्रकार के होते हैं। प्रथम अथवा उत्तम कोटि का वर्णन इस प्रकार है। उत्तम भक्त शास्त्रों में पारंगत और तदनुकूल तर्क करने में निपुण तथा युक्ति के साथ सिद्धान्त का प्रतिपादन करने में दक्ष होता है। उसे भक्तियोग की विधि का दृढ़ निश्चय करता है। वह भलीभाँति जानता है कि जीवन का परम लक्ष्य श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा की प्राप्ति है और एकमात्र श्रीकृष्ण ही प्रेमास्पद तथा आराध्य हैं। उत्तम भक्त वही हो सकता है जिसने सद्गुरु के शिक्षण में विधि-विधान का दृढ़ता से पालन करते हुए शास्त्र के अनुसार उनका निश्चल भाव से अनुसरण किया हो। इस प्रकार प्रचारक और गुरुरूप में कार्य करने की पूरी शिक्षा पाकर वह उत्तम अधिकारी हो जाता है। उत्तम भक्त आचार्यों के सिद्धान्तों से कभी विचलित नहीं होता तथा सम्पूर्ण युक्ति और तर्क से समझकर शास्त्र में प्रौढ श्रद्धा को प्राप्त हो जाता है। यहाँ युक्ति और तर्क का अभिप्राय
भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३१
शास्त्र पर आधारित तर्क-युक्ति से है। उत्तम भक्त समय का अपव्यय करनेवाले शुष्क मनोधर्म में रुचि नहीं लेता। भाव यह है कि जिसने भक्ति में दृढ़ निष्ठा को पा लिया है, उसे उत्तम भक्त जानना चाहिए। मध्यम भक्त के लक्षण इस प्रकार हैं। मध्यम भक्त शास्त्र के आधार पर तर्क करने में अधिक निपुण नहीं होता, पर लक्ष्य में प्रगाढ श्रद्धा रखता है। तात्पर्य यह है कि मध्यम भक्त कृष्णभक्ति में श्रद्धा तो रखता है, परन्तु कदाचित् विरोधी पक्ष के आगे शास्त्र के बल पर तर्क और निश्चय प्रस्तुत करने में असफल रह सकता है। फिर भी, यह निश्चय उसके हृदय में अचलभाव से रहता है कि श्रीकृष्ण परमाराध्य हैं। शास्त्र के निश्चय में अनिपुण और कोमल श्रद्धा वाला कनिष्ठ भक्त कहलाता है। उसकी श्रद्धा को कोई दूसरा अपने प्रबल तर्क अथवा विपरीत निर्णय से बदल सकता है। मध्यम भक्त के समान उसमें भी शास्त्र के आधार पर तर्क करने और प्रमाण देने की योग्यता नहीं होती। परन्तु जहाँ मध्यम अधिकारी में ध्येय में दृढ़ श्रद्धा रहती है, कनिष्ठ में ध्येय में कोई दृढ़ श्रद्धा भी नहीं होती। इसीलिए वह कनिष्ठ भक्त कहलाता है। भगवद्गीता में कनिष्ठ भक्तों का और अधिक वर्गीकरण है। वहाँ कथन है कि आर्त (विपदाग्रस्त), अर्थार्थी (धन का अभिलाषी), जिज्ञासु तथा ज्ञानी, ये चार प्रकार के मनुष्य भक्ति में प्रवृत्त हो कर अपनी-अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए श्रीभगवान् के उन्मुख होते हैं। वे किसी मन्दिर में जाकर भगवान् से कष्ट-निवारण, अर्थ प्राप्ति अथवा जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए याचना करते हैं। श्रीभगवान् की महिमा को जानने वाला ज्ञानी भी इन कनिष्ठों में आता है। शुद्धभक्तों का संग करने से ये मध्यम अथवा उत्तम भक्त बन सकते हैं। महाराज ध्रुव कनिष्ठ श्रेणी के अन्यतम उदाहरण हैं। उन्हें पिता के राज्य की इच्छा थी और इसी को लेकर वे भक्तियोग में प्रवृत्त हो गए। परन्तु अन्त में पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाने पर उन्होंने श्रीभगवान् से कोई लौकिक वरदान माँगने से इन्कार कर दिया। ऐसे ही, गजेन्द्र ने संकट में आत्मरक्षा के लिए श्रीकृष्ण को पुकारा था; बाद में वह शुद्धभक्त बन गया। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्, चारों कुमार ज्ञानी संतपुरुष थे, पर वे भी भक्ति की ओर आकर्षित हो गए। ठीक यही नैमिषारण्य के शौनकादि ऋषियों के साथ हुआ। वे बड़े जिज्ञासु थे, निरन्तर सूत गोस्वामी से श्रीकृष्ण विषयक प्रश्न किया करते थे। इस प्रकार शुद्धभक्त
३२] भक्तिरसामृतसिन्धु का सत्संग करके वे स्वयं भी शुद्धभक्त हो गए। आत्मा के उत्थान का यही मार्ग है। कोई किसी भी अवस्था में क्यों न हो, सौभाग्य से यदि शुद्धभक्त का संग मिल जाय, तो वह बड़ी शीघ्रता के साथ मध्यम अथवा उत्तम श्रेणी पर आरूढ हो जाता है। इन चारों प्रकार के भक्तों का वर्णन भगवद्गीता के सातवें अध्याय में है; इन सब को पुण्यात्मा कहा गया है। पुण्यात्मा हुए बिना भक्तियोग में प्रवेश नहीं हो सकता। भगवद्गीता में बताया है कि जिसने निरन्तर पुण्यकर्म किये हों और जिसके पापों का अन्त हो गया हो, वही कृष्णभावना को अंगीकार कर सकता है, दूसरे नहीं। पुण्यकर्मों के क्रम से ही कनिष्ठ भक्तों की आर्त, (विपदाग्रस्त), अर्थार्थी (धन का अभि- लाषी), जिज्ञासु और ज्ञानी नामक कोटियाँ हैं। पुण्यात्मा हुए बिना तो आर्त मनुष्य नास्तिक अथवा कम्युनिस्ट हो जाता है। उसका भगवान् में विश्वास नहीं होता; वह समझता है कि भगवान् से सम्पूर्ण विश्वास को हटा लेने से उसका सब कष्ट दूर हो जायगा। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि इन चार प्रकार के कनिष्ठ भक्तों में ज्ञानी उन्हें बड़ा प्रिय है, क्योंकि श्रीकृष्ण में उनकी आसक्ति किसी लौकिक लाभ के लिए नहीं होती। श्रीकृष्ण में आसक्त ज्ञानी कष्ट- निवारण अथवा धन-प्राप्ति के रूप में बदले में उनसे कुछ नहीं चाहता। इसका अर्थ है कि प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण में उसकी आसक्ति प्रेमवश है। इसके अतिरिक्त, ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन से भी वह यह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण साक्षात् स्वयं भगवान् हैं। भगवद्गीता का प्रमाण है कि अनेक-अनेक जन्मों के बाद कहीं जाकर यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष भली-भाँति जान पाता है कि वासुदेव (श्रीकृष्ण) सब कारणों के आदि कारण हैं और फिर उनके शरणागत हो जाता है। वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अनन्य रहता है। इस प्रकार शनैः-शनैः उसमें उनके लिए प्रेमभाव बढ़ता है। अतः ज्ञानी निःसन्देह श्रीकृष्ण का दयित है; परन्तु औरों को भी उदार कहा गया है, क्योंकि कष्ट अथवा धनाभाव के लिए ही क्यों न हों तृप्ति के लिए आए तो वे श्रीकृष्ण की शरण में ही हैं। इसलिए उन्हें भी महात्मा माना है। ज्ञानी हुए बिना भगवत्-उपासना के सिद्धान्त पर दृढ़ नहीं रहा जा सकता। जो अल्पमति हैं अथवा जिनकी मति माया द्वारा हर ली गयी है, वे प्रकृति के गुणों के प्रभाववश नाना देवताओं में आसक्त रहते हैं। ज्ञानी
भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३३ वह है जो भलीभाँति जान गया है कि वह देह से परे आत्मतत्त्व है। यह जानकर कि मैं आत्मा हूँ और श्रीकृष्ण परमात्मा हैं, वह अनुभव करता है कि उसका घनिष्ठ सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है, देह से नहीं। आर्त और अर्थार्थी दोनों देहात्मबुद्धि में हैं, क्योंकि कष्ट और धन की इच्छा का सम्बन्ध केवल देह से है। जिज्ञासु पुरुष आर्त और अर्थार्थी से थोड़ा ऊपर तो अवश्य है, पर है प्राकृत स्तर पर ही। परन्तु श्रीकृष्ण का अनन्य अभिलाषी ज्ञानी पूर्ण रूप से जानता है कि वह ब्रह्म है और श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं। वह यह भी जानता है कि आत्मा आधीन और अणु है, इसलिए उसे सदा अनन्त परम आत्मा श्रीकृष्ण के साथ सहयोग चाहिए। यह ज्ञानी पुरुष और श्रीकृष्ण का सम्बन्ध है। निष्कर्ष किया जा सकता है कि देहात्मबुद्धि से छूटा पुरुष शुद्ध भक्तियोग का अधिकारी है। भगवद्गीता में प्रमाण है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद, जब वह प्राकृत उद्वेगों से मुक्त होकर सम्पूर्ण जीवों को समभाव से देखता है, तब भक्तियोग में प्रवेश का अधिकारी होता है। जैसा पूर्व में कहा जा चुका है, सुख के तीन भेद हैं—विषयसुख, ब्रह्मसुख और भक्तिसुख। भक्ति और उसके सुख का उदय तब तक नहीं हो सकता, जब तक प्राकृतवासना रहती है। प्राकृतवासना में विषयभोग की इच्छा और ब्रह्मैक्य की इच्छा, दोनों आती हैं। निर्विशेषवादी श्रीभगवान् के संग से और उनके साथ प्रेमरस का विनिमय करने से मिलने वाले दिव्य सुख की महिमा नहीं जानते; इसीलिए वे श्रीभगवान् से एकत्व प्राप्ति को अपना परम लक्ष्य बना लेते हैं। यह विचार विषयवासना का ही एक सूक्ष्म रूप है। प्राकृत-जगत् में मनुष्यमात्र सबसे शक्तिशाली बनने के लिए प्रयत्नशील है। देहात्मबुद्धिवश वह अपनी जाति, अपने समाज और अपने देश में अन्य सबसे महान् बनने की स्पर्धा में लगा हुआ है। महान् बनने की यह अभिलाषा जब अनन्त तक बढ़ जाती है, तो वह सबसे महान्, श्रीभगवान् से ही एक हो जाना चाहता है। यह भी देहात्मबुद्धि का ही एक सूक्ष्म रूप है। परन्तु पूर्ण आत्मज्ञान अपने यथार्थ स्वरूप को जानना है, जिससे प्रेममयी भगवत्सेवा में तत्पर होने की विद्या का पूर्ण बोध हो जाता है। जीव को यह जानना चाहिए कि वह सीमित है, जबकि श्रीभगवान् अनन्त हैं। अतः इच्छा होने पर भी श्रीभगवान् से एक नहीं हुआ जा सकता। यह कभी सम्भव नहीं। इसलिए जो प्राकृत अथवा ब्रह्मरूप में अधिक से अधिक महान् बन कर इन्द्रियतृप्ति करने की इच्छा रखता है, वह भक्ति