भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[२८] भक्तिरसामृतसिन्धु
जब ब्राह्मण भोजन करे तो समझना चाहिए कि उसके माध्यम से भगवान् खा रहे हैं। परन्तु यह नहीं कि ब्राह्मण भगवान् के लिए खाने के नाम पर केवल भोजन करता रहे और विश्वभर में भगवद्गीता के सन्देश का प्रसारण न करे। वास्तव में गीता का प्रचारक भगवान् श्रीकृष्ण का बड़ा प्रिय है; इसका प्रमाण स्वयं गीता में विद्यमान है। ऐसा प्रचारक ही यथार्थ ब्राह्मण है और उसे भोजन कराने से साक्षात् श्रीभगवान् तृप्त होते हैं। इसी प्रकार, क्षत्रिय का कर्तव्य माया के आक्रमण से जनता की रक्षा करना है। महाराज परीक्षित ने जैसे ही यह देखा कि एक शूद्र वर्ण का व्यक्ति गोवध करने को उद्यत है, तो तत्काल उन्होंने उस दुष्ट कलि को मारने के लिए खड्ग उठा ली। यह क्षत्रिय का प्रधान कर्तव्य है। रक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रत्यक्ष आज्ञा दी है कि जनसाधारण की रक्षा के लिए वह कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में हिंसा करे। वैश्यों का कार्य कृषि-पदार्थों का उत्पादन, क्रय-विक्रय और वितरण करना है। शूद्र वर्ग में वे आते हैं, जिनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की बुद्धि का अभाव है। इस श्रेणी के लोग शारीरिक श्रम के द्वारा तीनों उच्च जातियों की सहायता करते हैं। इस विधि से सब वर्णों में पूर्ण सहयोग रहता है और सब पारमार्थिक प्रगति करते हैं। उपरोक्त सहयोग के अभाव में समाज का पतन हो जायगा। इस कलह के युग—कलि में यही स्थिति है। कोई अपना कर्तव्य नहीं निभाता, फिर भी सब ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय होने का अभिमान करते हैं। परन्तु वास्तव में ऐसे मनुष्यों की कोई स्थिति नहीं है। वे श्रीभगवान् से बहिर्मुख हैं, क्योंकि वे कृष्णभावनाभावित नहीं हैं। ऐसे में इस कृष्णभावना आन्दोलन का उद्देश्य सम्पूर्ण मानवसमाज को सुव्यवस्थित करना है, जिससे सब सुखी हों और कृष्णभावना का विकास करके लाभ उठायें। भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव को उपदेश किया है कि वर्णाश्रम के विधान का पालन करने से भगवान् तृप्त होते हैं; परिणाम में सम्पूर्ण समाज को जीवन की सब आवश्यक वस्तुयें सुगमता से सुलभ हो जाती हैं यह इसलिए है क्योंकि वास्तव में तो श्रीभगवान् ही सब प्राणियों के भर्त्ता हैं। यदि सारा समाज अपने कर्तव्यपालन में कटिबद्ध और कृष्णभावना- भावित रहे, तो इसमें सन्देह नहीं कि उसके सारे सदस्य बड़े ही सुख- शान्ति से रह सकेंगे। जीवन की आवश्यकताओं से भरापूरा सारा जगत्