भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

साधनभक्ति [ २६ वैकुण्ठ बन जायगा। भगवद्धाम में जाये बिना, केवल श्रीमद्भागवत का आज्ञापालन और कृष्णभावनाभावित कर्तव्यों का पालन करने से सारी मानवजाति सब प्रकार से सुखी हो जायगी। श्रीमद्भागवत (११.२७.४६) में ही एक अन्य वाक्य है, जिसमें श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे उद्धव ! सभी मनुष्य वैदिक-लौकिक क्रियाओं में लगे रहते हैं। यदि वे कृष्णभावनाभावित होकर इनमें से किसी भी प्रकार की क्रियाओं के फल से मेरी अर्चना करें, तो अपने-आप उनके लोक-परलोक दोनों सुखी हो जायेंगे, इसमें कुछ सन्देह नहीं।" श्रीकृष्ण के इस वाक्य से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कृष्णभावनाभावित क्रियाओं से सबकी सर्वाभीष्ट-सिद्धि होगी। इस प्रकार कृष्णभावनामृत आन्दोलन इतना उत्तम है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी—किसी भी उपाधि की आवश्यकता नहीं। मनुष्यमात्र जो कुछ कर रहा है, उसी में लगा रहकर अपनी कृष्णभावना- भावित क्रियाओं के फल से श्रीकृष्ण की आराधना करे। इससे सारी परि- स्थिति का समाधान हो जायगा और जगत् में सब सुख-शांति-लाभ करेंगे। 'नारदपंचरात्र' में भक्ति के इस विधि-विधान का वर्णन है : "शास्त्र में भगवान् की प्रसन्नता के लिए जो भी क्रियायें बताई गयी हैं, उसे संतपुरुष भक्ति की विधि मानते हैं। यदि कोई सद्गुरु के आश्रय में नियमित रूप से इस प्रकार भगवत्सेवा का आचरण करे तो शनैः-शनैः शुद्ध भगवत्प्रेममय सेवाभाव को प्राप्त हो जायगा।"