भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण पूर्णरूप से भगवद्भक्तिपरायण महात्माजनों के सत्संग के प्रभाव से किसी में श्रीकृष्ण के लिए किंचित् रुचि का उन्मेष हो सकता है। परन्तु साथ ही सकाम कर्मों और प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति बनी रह सकती है, जिस कारण नाना प्रकार का तप-त्याग करना अच्छा नहीं लगता। यदि ऐसे पुरुष की श्रीकृष्ण में अनन्य आसक्ति हो जाय तो वह भक्तियोग का अधिकारी बन जाता है। शुद्धभक्तों के सत्संग में कृष्णभावना की ओर ऐसा आकर्षण बड़े सौभाग्य का सूचक है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का प्रमाण है कि कोई भाग्य- वान् पुरुष ही सद्गुरु और श्रीकृष्ण की कृपा से भक्तिरूप लता के बीज को पाता है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (११.२०.८) में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! दुर्लभ भाग्यवश ही कोई मुझमें आसक्त होता है। यदि वह सकाम कर्मों से पूर्णरूप से विरक्त न भी हो अथवा भक्ति में पूरा आसक्त न हुआ हो, तो भी मेरी सेवा शीघ्र प्रभाव दिखाती है।" भक्त तीन प्रकार के होते हैं। प्रथम अथवा उत्तम कोटि का वर्णन इस प्रकार है। उत्तम भक्त शास्त्रों में पारंगत और तदनुकूल तर्क करने में निपुण तथा युक्ति के साथ सिद्धान्त का प्रतिपादन करने में दक्ष होता है। उसे भक्तियोग की विधि का दृढ़ निश्चय करता है। वह भलीभाँति जानता है कि जीवन का परम लक्ष्य श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा की प्राप्ति है और एकमात्र श्रीकृष्ण ही प्रेमास्पद तथा आराध्य हैं। उत्तम भक्त वही हो सकता है जिसने सद्गुरु के शिक्षण में विधि-विधान का दृढ़ता से पालन करते हुए शास्त्र के अनुसार उनका निश्चल भाव से अनुसरण किया हो। इस प्रकार प्रचारक और गुरुरूप में कार्य करने की पूरी शिक्षा पाकर वह उत्तम अधिकारी हो जाता है। उत्तम भक्त आचार्यों के सिद्धान्तों से कभी विचलित नहीं होता तथा सम्पूर्ण युक्ति और तर्क से समझकर शास्त्र में प्रौढ श्रद्धा को प्राप्त हो जाता है। यहाँ युक्ति और तर्क का अभिप्राय