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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 380 में से

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पृष्ठ 58

भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३१

शास्त्र पर आधारित तर्क-युक्ति से है। उत्तम भक्त समय का अपव्यय करनेवाले शुष्क मनोधर्म में रुचि नहीं लेता। भाव यह है कि जिसने भक्ति में दृढ़ निष्ठा को पा लिया है, उसे उत्तम भक्त जानना चाहिए। मध्यम भक्त के लक्षण इस प्रकार हैं। मध्यम भक्त शास्त्र के आधार पर तर्क करने में अधिक निपुण नहीं होता, पर लक्ष्य में प्रगाढ श्रद्धा रखता है। तात्पर्य यह है कि मध्यम भक्त कृष्णभक्ति में श्रद्धा तो रखता है, परन्तु कदाचित् विरोधी पक्ष के आगे शास्त्र के बल पर तर्क और निश्चय प्रस्तुत करने में असफल रह सकता है। फिर भी, यह निश्चय उसके हृदय में अचलभाव से रहता है कि श्रीकृष्ण परमाराध्य हैं। शास्त्र के निश्चय में अनिपुण और कोमल श्रद्धा वाला कनिष्ठ भक्त कहलाता है। उसकी श्रद्धा को कोई दूसरा अपने प्रबल तर्क अथवा विपरीत निर्णय से बदल सकता है। मध्यम भक्त के समान उसमें भी शास्त्र के आधार पर तर्क करने और प्रमाण देने की योग्यता नहीं होती। परन्तु जहाँ मध्यम अधिकारी में ध्येय में दृढ़ श्रद्धा रहती है, कनिष्ठ में ध्येय में कोई दृढ़ श्रद्धा भी नहीं होती। इसीलिए वह कनिष्ठ भक्त कहलाता है। भगवद्गीता में कनिष्ठ भक्तों का और अधिक वर्गीकरण है। वहाँ कथन है कि आर्त (विपदाग्रस्त), अर्थार्थी (धन का अभिलाषी), जिज्ञासु तथा ज्ञानी, ये चार प्रकार के मनुष्य भक्ति में प्रवृत्त हो कर अपनी-अपनी अभीष्ट-सिद्धि के लिए श्रीभगवान् के उन्मुख होते हैं। वे किसी मन्दिर में जाकर भगवान् से कष्ट-निवारण, अर्थ प्राप्ति अथवा जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए याचना करते हैं। श्रीभगवान् की महिमा को जानने वाला ज्ञानी भी इन कनिष्ठों में आता है। शुद्धभक्तों का संग करने से ये मध्यम अथवा उत्तम भक्त बन सकते हैं। महाराज ध्रुव कनिष्ठ श्रेणी के अन्यतम उदाहरण हैं। उन्हें पिता के राज्य की इच्छा थी और इसी को लेकर वे भक्तियोग में प्रवृत्त हो गए। परन्तु अन्त में पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाने पर उन्होंने श्रीभगवान् से कोई लौकिक वरदान माँगने से इन्कार कर दिया। ऐसे ही, गजेन्द्र ने संकट में आत्मरक्षा के लिए श्रीकृष्ण को पुकारा था; बाद में वह शुद्धभक्त बन गया। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्, चारों कुमार ज्ञानी संतपुरुष थे, पर वे भी भक्ति की ओर आकर्षित हो गए। ठीक यही नैमिषारण्य के शौनकादि ऋषियों के साथ हुआ। वे बड़े जिज्ञासु थे, निरन्तर सूत गोस्वामी से श्रीकृष्ण विषयक प्रश्न किया करते थे। इस प्रकार शुद्धभक्त