भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२] भक्तिरसामृतसिन्धु का सत्संग करके वे स्वयं भी शुद्धभक्त हो गए। आत्मा के उत्थान का यही मार्ग है। कोई किसी भी अवस्था में क्यों न हो, सौभाग्य से यदि शुद्धभक्त का संग मिल जाय, तो वह बड़ी शीघ्रता के साथ मध्यम अथवा उत्तम श्रेणी पर आरूढ हो जाता है। इन चारों प्रकार के भक्तों का वर्णन भगवद्गीता के सातवें अध्याय में है; इन सब को पुण्यात्मा कहा गया है। पुण्यात्मा हुए बिना भक्तियोग में प्रवेश नहीं हो सकता। भगवद्गीता में बताया है कि जिसने निरन्तर पुण्यकर्म किये हों और जिसके पापों का अन्त हो गया हो, वही कृष्णभावना को अंगीकार कर सकता है, दूसरे नहीं। पुण्यकर्मों के क्रम से ही कनिष्ठ भक्तों की आर्त, (विपदाग्रस्त), अर्थार्थी (धन का अभि- लाषी), जिज्ञासु और ज्ञानी नामक कोटियाँ हैं। पुण्यात्मा हुए बिना तो आर्त मनुष्य नास्तिक अथवा कम्युनिस्ट हो जाता है। उसका भगवान् में विश्वास नहीं होता; वह समझता है कि भगवान् से सम्पूर्ण विश्वास को हटा लेने से उसका सब कष्ट दूर हो जायगा। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि इन चार प्रकार के कनिष्ठ भक्तों में ज्ञानी उन्हें बड़ा प्रिय है, क्योंकि श्रीकृष्ण में उनकी आसक्ति किसी लौकिक लाभ के लिए नहीं होती। श्रीकृष्ण में आसक्त ज्ञानी कष्ट- निवारण अथवा धन-प्राप्ति के रूप में बदले में उनसे कुछ नहीं चाहता। इसका अर्थ है कि प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण में उसकी आसक्ति प्रेमवश है। इसके अतिरिक्त, ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन से भी वह यह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण साक्षात् स्वयं भगवान् हैं। भगवद्गीता का प्रमाण है कि अनेक-अनेक जन्मों के बाद कहीं जाकर यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष भली-भाँति जान पाता है कि वासुदेव (श्रीकृष्ण) सब कारणों के आदि कारण हैं और फिर उनके शरणागत हो जाता है। वह श्रीकृष्ण के चरणकमलों में ही अनन्य रहता है। इस प्रकार शनैः-शनैः उसमें उनके लिए प्रेमभाव बढ़ता है। अतः ज्ञानी निःसन्देह श्रीकृष्ण का दयित है; परन्तु औरों को भी उदार कहा गया है, क्योंकि कष्ट अथवा धनाभाव के लिए ही क्यों न हों तृप्ति के लिए आए तो वे श्रीकृष्ण की शरण में ही हैं। इसलिए उन्हें भी महात्मा माना है। ज्ञानी हुए बिना भगवत्-उपासना के सिद्धान्त पर दृढ़ नहीं रहा जा सकता। जो अल्पमति हैं अथवा जिनकी मति माया द्वारा हर ली गयी है, वे प्रकृति के गुणों के प्रभाववश नाना देवताओं में आसक्त रहते हैं। ज्ञानी