भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३३ वह है जो भलीभाँति जान गया है कि वह देह से परे आत्मतत्त्व है। यह जानकर कि मैं आत्मा हूँ और श्रीकृष्ण परमात्मा हैं, वह अनुभव करता है कि उसका घनिष्ठ सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है, देह से नहीं। आर्त और अर्थार्थी दोनों देहात्मबुद्धि में हैं, क्योंकि कष्ट और धन की इच्छा का सम्बन्ध केवल देह से है। जिज्ञासु पुरुष आर्त और अर्थार्थी से थोड़ा ऊपर तो अवश्य है, पर है प्राकृत स्तर पर ही। परन्तु श्रीकृष्ण का अनन्य अभिलाषी ज्ञानी पूर्ण रूप से जानता है कि वह ब्रह्म है और श्रीकृष्ण परब्रह्म हैं। वह यह भी जानता है कि आत्मा आधीन और अणु है, इसलिए उसे सदा अनन्त परम आत्मा श्रीकृष्ण के साथ सहयोग चाहिए। यह ज्ञानी पुरुष और श्रीकृष्ण का सम्बन्ध है। निष्कर्ष किया जा सकता है कि देहात्मबुद्धि से छूटा पुरुष शुद्ध भक्तियोग का अधिकारी है। भगवद्गीता में प्रमाण है कि ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद, जब वह प्राकृत उद्वेगों से मुक्त होकर सम्पूर्ण जीवों को समभाव से देखता है, तब भक्तियोग में प्रवेश का अधिकारी होता है। जैसा पूर्व में कहा जा चुका है, सुख के तीन भेद हैं—विषयसुख, ब्रह्मसुख और भक्तिसुख। भक्ति और उसके सुख का उदय तब तक नहीं हो सकता, जब तक प्राकृतवासना रहती है। प्राकृतवासना में विषयभोग की इच्छा और ब्रह्मैक्य की इच्छा, दोनों आती हैं। निर्विशेषवादी श्रीभगवान् के संग से और उनके साथ प्रेमरस का विनिमय करने से मिलने वाले दिव्य सुख की महिमा नहीं जानते; इसीलिए वे श्रीभगवान् से एकत्व प्राप्ति को अपना परम लक्ष्य बना लेते हैं। यह विचार विषयवासना का ही एक सूक्ष्म रूप है। प्राकृत-जगत् में मनुष्यमात्र सबसे शक्तिशाली बनने के लिए प्रयत्नशील है। देहात्मबुद्धिवश वह अपनी जाति, अपने समाज और अपने देश में अन्य सबसे महान् बनने की स्पर्धा में लगा हुआ है। महान् बनने की यह अभिलाषा जब अनन्त तक बढ़ जाती है, तो वह सबसे महान्, श्रीभगवान् से ही एक हो जाना चाहता है। यह भी देहात्मबुद्धि का ही एक सूक्ष्म रूप है। परन्तु पूर्ण आत्मज्ञान अपने यथार्थ स्वरूप को जानना है, जिससे प्रेममयी भगवत्सेवा में तत्पर होने की विद्या का पूर्ण बोध हो जाता है। जीव को यह जानना चाहिए कि वह सीमित है, जबकि श्रीभगवान् अनन्त हैं। अतः इच्छा होने पर भी श्रीभगवान् से एक नहीं हुआ जा सकता। यह कभी सम्भव नहीं। इसलिए जो प्राकृत अथवा ब्रह्मरूप में अधिक से अधिक महान् बन कर इन्द्रियतृप्ति करने की इच्छा रखता है, वह भक्ति