भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के मधुररस का वास्तविक आस्वादन कर ही नहीं सकता। इसीलिए श्रील रूप गोस्वामी ने हृदय में भुक्ति-मुक्ति की इच्छाओं के होने को पिशाची बताया है; दोनों कष्टदायक हैं। भुक्ति का अर्थ विषयसुख है और मुक्ति का अभिप्राय भवबन्धन से छूटकर भगवान् से एकत्व प्राप्त करना है। ये दोनों पिशाची हैं, क्योंकि जब तक विषयसुख अथवा ब्रह्मैक्य की इच्छा रहेगी, तब तक भक्ति के यथार्थ दिव्य सुख का आस्वादन कोई नहीं कर सकता। शुद्धभक्त मुक्ति की चिन्ता कभी नहीं करता। श्रीचैतन्य महाप्रभु की श्रीकृष्ण से प्रार्थना है, "हे नन्दकुमार (श्रीकृष्ण) ! मुझे बहुत से अनु- यायियों का सुख, धन का ऐश्वर्य और सुन्दर स्त्री नहीं चाहिए और न भवबन्धन से मुक्ति का ही मैं अभिलाषी हूँ। जन्म-जन्मान्तर में आपके चरणों में मेरी अनन्यभक्ति हो, बस यही प्रार्थना है।" शुद्धभक्त का ध्यान भगवान् के नाम, गुण, रूप, लीला, धाम आदि के यशोगान में इतना आकृष्ट रहता है कि मुक्ति तक की परवाह नहीं करता। श्री बिल्वमंगल ठाकुर का उद्गार है, "हे प्राणप्रिये प्रभो ! आपकी भक्ति के परायण मुझे सर्वत्र आपकी ही स्फूर्ति होती है। ऐसे में मुक्ति मेरी सेवा के अवसर की प्रतीक्षा में द्वार पर करबद्ध खड़ी है।" शुद्धभक्तों के लिए मुक्ति अथवा ब्रह्मैक्य का कुछ भी महत्त्व नहीं है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (३.२५.३६) में भगवान् कपिल माता देवहूति को उपदेश करते हुए कहते हैं, "हे जननि ! मेरे शुद्धभक्त मेरे नाना रूपों, मेरे मुखमण्डल की माधुरी और मोहक अवयवों को देखने में मुग्ध रहते हैं। मेरा हँसना, मेरी क्रीड़ा और मेरा देखना उन्हें इतना मधुर लगता है कि उनके विचार मुझमें ही लगे रहते हैं; वरन् उनका सम्पूर्ण जीवन ही मेरे अर्पण हो जाता है। यद्यपि उन्हें किसी भी प्रकार का मोक्षसुख या प्राकृतसुख नहीं चाहिए, परन्तु मैं उन्हें अपने परमधाम में पार्षदपद दे देता हूँ।" श्रीमद्भागवत के इस प्रमाण से शुद्धभक्तों को आश्वासन मिलता है कि वे श्रीभगवान् का संग अवश्य प्राप्त करेंगे। इस सन्दर्भ में श्रील रूप गोस्वामीपाद कहते हैं कि जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों अथवा उनकी सेवा की मधुरिमा के प्रति आकृष्ट हो गया है और इस आकर्षणवश जिसका चित्त निरन्तर दिव्यसुख से ओतप्रोत रहता है, ऐसे भक्त को स्वाभाविक रूप में उस मोक्ष की कभी इच्छा नहीं होती, जो निर्विशेष- वादियों के लिए इतना महत्त्वपूर्ण है।