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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 380 में से

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भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३५ इसी के समान, तृतीय स्कन्ध (३.३.१५) में उद्धव भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है, 'प्रभो ! आपके चरणकमलों की दिव्य प्रेममयी सेवा करने वालों के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से कुछ भी प्राप्त होने योग्य नहीं रहता, यद्यपि इनसे होने वाले सुख उन्हें बड़ी सुगमता से मिल सकते हैं। फिर भी हे सर्वशक्तिमान् ! मैं आपसे मोक्ष आदि को नहीं चाहता। मुझे तो बस आपके चरणकमलों में अनन्य श्रद्धा-भक्ति ही चाहिए ।" इसी प्रकार, तृतीय स्कन्ध, अध्याय २५ के श्लोक ३१ में भगवान् कपिल कहते हैं, "हे माता ! जिनका हृदय मेरे चरणों की सेवा से ओतप्रोत है और मेरी तृप्ति के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, विशेष रूप से जो मेरे नाम, रूप, गुण और यश का संकीर्तन करते हुए दिव्य परमानन्दसिंधु में मग्न रहते हैं, वे भाग्यवान् भक्त मुझसे एक होने की कभी इच्छा नहीं करते । मुझसे एक होना तो दूर, मेरी भक्ति में तृप्त रहने वाले भक्तजन तो मेरे द्वारा दिये जाने पर भी सालोक्य, साष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्ति तक को लेना नहीं चाहते ।" श्रीमद्भागवत (४.६.१०) में ही ध्रुव महाराज कहते हैं, "हे देव ! आपके चरणकमलों का ध्यान करने से मनुष्य को जिस दिव्य सुख की प्राप्ति होती है, निर्विशेषवादियों को ब्रह्म-साक्षात्कार से उसका आभास भी नहीं हो सकता। फिर उच्च स्वर्गीय लोकों को जाने की इच्छा से सकामकर्म करने वाले आपको कैसे जान सकते हैं, और उन्हें भक्तों के समान सुखी किस प्रकार समझा जाय ।''

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