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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 380 में से

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पृष्ठ 63

अध्याय ४ भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है भक्त का भगवान् की भक्ति में कितना अनुराग होता है, यह आदि- राज महाराज पृथु के वाक्य से समझा जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२०.२४) में वे कहते हैं, “हे देव ! यदि मुक्ति होने पर आपके चरण- कमलों के जयगान में शुद्ध भक्तों के हृदय से गूंजने वाली आपकी अमृतमय कीर्ति सुनने को नहीं मिलती तो मैं उस मोक्ष अथवा ब्रह्मैक्य को कभी नहीं लूंगा। मेरी तो बस निरन्तर यही प्रार्थना है कि आप मुझे असंख्य जिह्वा और कान प्रदान कीजिए, जिससे मैं सर्वदा आपकी दिव्य कीर्ति का श्रवण-कीर्तन करता हुआ परमानन्द में निमग्न रहूँ।” निर्विशेषवादी भगवान् में लीन हो जाना चाहते हैं। वे नहीं जानते कि अपना निजी स्वरूप बनाए रखे बिना जीव भगवत्-कीर्ति का श्रवण- कीर्तन नहीं कर सकता। उन्हें भगवान् के दिव्य विग्रह का कुछ भी बोध नहीं होता, इसलिए भगवान् की दिव्य लीला का श्रवण-कीर्तन वे नहीं कर सकते। भाव यह है कि मुक्ति से ऊपर उठे बिना भगवत्-कीर्ति का आस्वादन अथवा दिव्य भगवत्-विग्रह के तत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवत (५.१४.४४) में ही एक अन्य सदृश वाक्य है। शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कह रहे हैं, “भक्तप्रवर राजा भरत श्रीकृष्ण के चरणारविन्द की सेवा में इतने अतिशय अनुरक्त थे कि उन्होंने बड़ी सुगमता से पृथ्वी पर अपने शासन तथा पुत्र, समाज, मित्र, राजऐश्वर्य और सुन्दर स्त्री के मोह को त्याग दिया। देवगण भी जिसके लिए ललचाते रहते हैं, वे लक्ष्मीदेवी तक उनपर प्रसन्न थीं। पर उन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा।” राजा भरत के इस आदर्श व्यवहार की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए शुकदेव आगे कहते हैं, “भगवान् की सेवा में जिनका मन अनुरक्त है, भोगों की तो बात ही क्या, उनके लिए तो महामुनियों द्वारा वाँछित मोक्ष भी तुच्छ हो जाता है।”