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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ३७ श्रीमद्भागवत (६.११.२५) में वृत्रासुर भगवान् से कहता है, “हे भगवान् ! आपकी भक्ति को छोड़कर मैं न स्वर्गपद को, न महेन्द्रपद को, न त्रिलोकी के सार्वभौम राज्य को, न योग की सिद्धियों को और न मोक्ष को ही चाहता हूँ । मुझे तो बस आपके शाश्वत् संग और प्रेमसेवा की इच्छा है ।” इस वाक्य की पुष्टि करते हुए भगवान् शिव सती से श्रीमद्भागवत (६.१७.२८) में कहते हैं, “हे साध्वि ! नारायणभक्त किसी से नहीं डरते । स्वर्ग हो, मोक्ष हो, या नरक, उनके लिए सब समान है । भगवान् नारायण के चरणकमलों के शरणागत हो जाने मात्र से उनके लिए प्राकृत-जगत् की सभी परिस्थितियाँ एक जैसी हो जाती हैं ।” श्रीमद्भागवत (६.१८.७४) में इन्द्र अपनी माता अदिति का सम्बोधन करते हुए कहते हैं, “हे माता ! निष्कामभाव से केवल भगवान् की भक्ति करने वाले भक्तजन ही वास्तव में अपने स्वार्थ को जानते हैं । ऐसे पुरुष वास्तव में स्वार्थकुशल हैं, और जीवन की संसिद्धि की ओर उन्नति करने में परम दक्ष माने जाते हैं ।” महाराज प्रह्लाद (७.६.२५) का वचन है, “हे दैत्यमित्रो ! भगवान् के प्रसन्न होने पर संसार में क्या दुर्लभ रह सकता है ? यदि भगवान् तुष्ट हो जायें, तो तुम्हारे हृदय के सम्पूर्ण मनोरथ निस्सन्देह सिद्ध हो जायेंगे । इसलिए त्रिगुणमयी प्रकृति द्वारा अपने-आप सिद्ध होने वाले सकामकर्मों से क्या लाभ ? निरन्तर भगवत्-कीर्ति का गान करते हुए उनकी चरणमाधुरी का आस्वादन करने वाले के लिए मोक्ष से भी क्या लाभ ?” प्रह्लाद महाराज के इस वाक्य से स्पष्ट है कि जो भगवान् की दिव्य कीर्ति के श्रवण-कीर्तन में सुख का अनुभव करता है, वह सब प्रकार से प्राकृतसुखों—पुण्यकर्मों, यज्ञों और मोक्ष तक का उल्लंघन कर चुका है । इसी भाँति, सातवें स्कन्ध के अध्याय आठ, श्लोक ४२ में भगवान् नृसिंह की स्तुति करते हुए इन्द्र कहते हैं, “हे परम पुरुष ! ये दैत्य यज्ञों में हमारे भाग का अपहरण करना चाहते थे; परन्तु नृसिंह रूप से प्रकट होकर आपने महाभय से हमारा त्राण कर दिया है। वास्तव में हमारा यज्ञभाग आपसे ही है, क्योंकि आप सम्पूर्ण यज्ञों के परम भोक्ता हैं। आप जीवमात्र के अन्त- र्यामी, सबके यथार्थ स्वामी हैं। हमारे हृदय बहुत समय से इस दैत्य हिरण्यक- शिपु के भय से आक्रान्त थे; परन्तु आप हम पर इतने कृपाशील हैं कि इसे मार कर आपने हमारे हृदयों से भय को भगा दिया है और हमें अवसर