भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु दिया है कि हम आपको अपने हृदय में फिर अभिराजित कर सकें। आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा के परायण भक्तों के लिए वे सब ऐश्वर्य तृणतुल्य हैं जिनका दैत्यों ने हमसे अपहरण किया था। भक्त तो मोक्ष की भी चिन्ता नहीं करते, फिर इन प्राकृत ऐश्वर्यों का क्या कहना। वास्तव में यज्ञ के भोक्ता हम नहीं हैं। हे नाथ ! हमारा तो बस यही कर्तव्य है कि सदा आपकी सेवा में लगे रहें, क्योंकि आप ही सबके भोक्ता हैं।" इन्द्र के इस वाक्य का यह तात्पर्य है कि ब्रह्मा से लेकर तुच्छ चिंटि तक कोई भी जीव प्राकृत ऐश्वर्य का भोग करने के लिए नहीं है। सबको अपना सर्वस्व भगवान् को अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें अपने- आप लाभ होगा। शरीर के अंग सामग्री जुटा कर उदरपूर्ति के लिए भोजन बनाते हैं, क्योंकि उदरपूर्ति होने पर शरीर के सभी अंगों को समान रूप से लाभ होता है। इसी भाँति, सबका कर्तव्य है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण को प्रसन्न करें। तब अपने-आप सबको सुख मिलेगा। श्रीमद्भागवत (८.३.२०) में इसी के समान, गजेन्द्र ने कहा है, "प्रभो ! आपके भक्तियोग के दिव्य सुख का मुझे अनुभव नहीं है, इसी लिए आपकी कृपा की याचना करता हूँ। वास्तव में तो महापुरुषों के चरण- कमलों की सेवा करके जो सम्पूर्ण वासनाओं से छूट चुके हैं, वे शुद्धभक्त सदा परमानन्द सिन्धु में निमग्न रहते हैं। आपके परम मंगलमय चरित्र का गान करते हुए वे संतुष्ट रहते हैं; अतः और कुछ नहीं चाहते।" स्कन्ध नौ, अध्याय ४, श्लोक ६७ में वैकुण्ठनाथ दुर्वासा से कहते हैं, "मेरी भक्ति से भरे हुए भक्तजन सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य, साष्टि और सामीप्य नामक पाँच प्रकार की मुक्ति भी नहीं चाहते; फिर अन्य विनश्वर पदार्थों की तो बात ही क्या है।" भागवत के दसवें स्कन्ध (अध्याय १६, श्लोक ३७) में नागपत्नियाँ प्रार्थना करती हैं, "हे गोविन्द ! आपके चरणसरोज की रज बड़ी अद्भुत है। जिस भाग्यवान् को यह सुलभ हो जाती है, वह न स्वर्गपद को, न सार्वभौम राज्य को, न योगसिद्धि और न मोक्ष को ही चाहता है। आपकी चरणरज का अनुरागी अन्य किसी भी सिद्धि की इच्छा नहीं करता।" दसवें स्कन्ध (अध्याय ८७, श्लोक २१) में मूर्तिमान् वेदश्रुतियाँ कहती हैं, "भगवन् ! आत्मज्ञान को जानना बड़ा कठिन है। हमें इसका बोध कराने के लिए ही आप अपने स्वयंरूप में प्रकट हुए हैं। इसी के लिए गृहसुख को त्याग कर परमहंस आचार्यों का सत्संग करने वाले भक्त आपकी भक्ति- रूप अमृत के महासागर में निमग्न रहकर मुक्ति की कामना नहीं करते।"