भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ३६ इस श्लोक को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि आत्म- ज्ञान आत्मा और परमात्मा दोनों के ज्ञान का वाचक है। जीवात्मा और परमात्मा दिव्य गुणों में एक हैं, इसलिए दोनों को 'ब्रह्म' कहा जाता है। परन्तु ब्रह्म का ज्ञान बड़ा दुर्जेय है। कितने ही दार्शनिक आत्मतत्त्व को समझने का प्रयास करते हैं, पर अधिक उन्नति नहीं कर पाते। भगवद्- गीता से प्रमाणित है कि करोड़ों मनुष्यों में कोई एक आत्मतत्त्व की जिज्ञासा करता है और बहुत से जिज्ञासुओं में भी कोई एक ही भगवान् को तत्त्व से जानता है। श्लोक का तात्पर्य हुआ कि आत्मतत्त्व बड़ा कठिन है, इसलिए श्रीभगवान् स्वयं आदि रूप में प्रकट होकर अर्जुन जैसे पार्षदों को प्रत्यक्ष रूप से उपदेश करते हैं, जिससे जनसाधारण इस आत्मविद्या का लाभ उठा सके। इस श्लोक से यह भी स्पष्ट है कि मुक्ति का अर्थ सब प्राकृत सुखों को पूर्ण रूप से त्याग देना है। निर्विशेषवादी भवबन्धन की मुक्ति से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं । भक्त मुक्तिलाभ तो करते ही हैं; साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्ण के अद्भुत चरित्र के श्रवण-कीर्तन के दिव्य आनन्द का भी रसास्वादन करते हैं। भागवत (११.२०.३४) में श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं- "हे उद्धव ! पूर्ण रूप से मेरी सेवा के आश्रित हुए भक्तजन भक्तियोग में इतने दृढ़ (अनन्य) रहते हैं कि अन्य अभिलाषाओं का उनमें बिल्कुल अभाव हो जाता है। मेरे द्वारा दिए जाने पर चार प्रकार के मोक्ष को भी वे नहीं लेते, फिर प्राकृत-जगत् की किसी वस्तु का क्या कहना है।" अन्यत्र (११.१४.१४) भी श्रीकृष्ण का कथन है, "हे उद्धव ! मेरे चिन्तन और लीला में अर्पित मन-बुद्धि वाला ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सार्वभौम आधिपत्य, योगसिद्धि अथवा मुक्ति तक की इच्छा नहीं करता।" श्रीमद्- भागवत (१२.१०.६) में शिवजी पार्वती से कहते हैं, "देवि ! ये महान् ब्रह्मर्षि मारकण्डेय भगवान् की अनन्य श्रद्धा-भक्ति को प्राप्त हो गये हैं। इसलिए अब ये कुछ नहीं चाहते, यहाँ तक कि संसार से मुक्ति भी नहीं।" 'पद्मपुराण' के कार्तिकमाहात्म्य में इस सिद्धान्त का समर्थन है। इस समय वृन्दावन में भगवान् श्रीकृष्ण के दामोदर रूप की उपासना करने का विधान है। दामोदररूप श्रीकृष्ण की उस बाललीला का द्योतक है, जब वे माता यशोदा द्वारा बाँधे गए थे (दाम अर्थात् बंधन)। श्रीकृष्ण के चांचल्य से रुष्ट होकर यशोदा मैया ने उन्हें रस्सी से बाँधा था; इसीलिए वे दामोदर कहलाए। कार्तिक में भगवान् दामोदर से निवेदन करते हैं,