भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु “हे प्रभो ! हे वरों के स्वामिन् ! ब्रह्मा और शिव आदि देवता हिरण्यकशिपु, रावण जैसे अपने भक्तों को बहुत से वर दिया करते हैं; परन्तु ब्रह्मा, शिव भी आपके वरों पर आश्रित हैं।” यही कारण है कि श्रीकृष्ण को वरों का स्वामी कहा गया है। वे भक्तों को कुछ भी वर दे सकते हैं; पर भक्तों की प्रार्थना है, “मुझे किसी प्राकृतसुख या मुक्ति की इच्छा नहीं है। बस इतना वर दीजिए कि आपका यह दामोदर रूप सदा मेरे हृदय में बसा रहे। आपके इस मधुर मनोहर रूप के अतिरिक्त मेरा चित्त और कुछ नहीं चाहता ।” इस प्रार्थना के अगले श्लोक में कहा है, “हे दामोदर ! एक समय नन्द महाराज के प्रांगण में चंचल क्रीड़ा करते हुए आपने दही का भाण्ड फोड़ डाला था। उस पर यशोदा मैया ने आपको रस्सी से ऊखल से बाँध दिया। तब आपने नन्दजी के आंगन में यमलार्जुन के रूप में खड़े नलक्कूवर और मणिग्रीव का उद्धार करके अपनी भक्ति का अधिकारी बनाया। कृपामयी लीला करके मुझे भी अपनी भक्ति प्रदान कीजिए, मुझे मुक्ति का आग्रह नहीं है ।” देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के दोनों पुत्र अपने पिता के ऐश्वर्य के मद में मत्त हो रहे थे। एक समय वे किसी दिव्यलोक में नग्न अप्सराओं के साथ विलासमग्न थे। तभी महामुनि नारद मार्ग से जा रहे थे। उन्हें कुबेरपुत्रों के अभद्र व्यवहार पर हार्दिक दुःख हुआ। नारदजी को जाते देखकर अप्सराओं ने तो वस्त्रधारण कर लिए, परन्तु मद्यप कुबेरपुत्रों को लज्जा नहीं आयी । उनके व्यवहार से क्रुद्ध होकर नारदजी ने शाप दिया, “तुम दोनों सर्वथा निर्लज्ज हो रहे हो, इसलिए कुबेरपुत्र होने के स्थान पर वृक्ष बन जाओ।” यह सुनने पर दोनों को चेतना हुई और नारद जी से क्षमा माँगने लगे। तब नारद ने कहा, “तुम अर्जुन के वृक्ष बन कर नन्द महाराज के आँगन में खड़े रहोगे। नन्द महाराज के पुत्ररूप में जब श्रीकृष्ण प्रकट होंगे, तब तुम्हारा उद्धार होगा।” प्रकारा- न्तर से, नारद का शाप कुबेरपुत्रों के लिए वरदान सिद्ध हुआ, क्योंकि इससे उन्हें पूर्वसूचना मिल गयी कि उनपर श्रीकृष्ण का अनुग्रह होगा। उसके बाद दोनों कुबेरपुत्र नन्दजी के घर में यमलार्जुन के रूप में खड़े रहे। कालान्तर में नारद की वाणी सत्य करने को भगवान् दामोदर ने ऊखल से पेड़ों को गिराकर उन का उद्धार किया। नलकुबर और मणिग्रीव अब तक महाभागवत बन गए थे। गिरे वृक्षों से निकलकर उन्होंने भगवान् दामोदर की अभ्यर्थना की । ‘हयशीर्ष पञ्चरात्र’ में उल्लेख है, “हे प्रभो ! हे भगवन् ! मैं धर्म’