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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 380 में से

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पृष्ठ 68

भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़ कर है [ ४१ अर्थ, काम और मोक्ष को नहीं चाहता । बस इतनी ही अभिलाषा है कि मैं सदा आपके चरणकमलों का दास बना रहूँ। कृपया मुझपर यह अनुग्रह करें ।" उसी ‘हयशीर्ष पञ्चरात्र' में उल्लेख है कि नृसिंहदेव के बारम्बार आग्रह करने पर भी प्रह्लाद महाराज ने कोई विषयवस्तु नहीं माँगी, अपितु सदा भक्ति के परायण करने का ही वर चाहा । इस सन्दर्भ में प्रह्लाद महाराज ने भगवान् रामचन्द्र के नित्यदास हनुमान् जी का उदाहरण दिया । हनुमान् ने भगवान् से कोई भी प्राकृत वरदान न माँगने का आदर्श स्थापित किया है । वे सदा भगवत्सेवा के परायण रहे । इस आदर्श गुण के लिए वे आज तक भक्तों के आराध्य हैं । प्रह्लाद महाराज ने भी हनुमान्जी का सादर अभिवादन किया । श्रीहनुमान् का प्रसिद्ध वचन है, “मैं भवबन्धन से उस मोक्ष को अथवा आप के सायुज्य को नहीं चाहता, जिसके आप प्रभु हैं और मैं आपका दास हूँ-इस भाव का लोप हो जाय ।" ‘नारदपञ्चरात्र' के एक अन्य श्लोक में कहा है, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है । बस यही प्रार्थना है कि अपने चरणकमलों की छाया में मुझे जीने दीजिए । हे धरणीधर ! मैं सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियों को नहीं चाहता । मुझे तो केवल आपकी दया की कामना है, जिससे निरन्तर आपकी प्रेममयी सेवा के परायण रहूँ ।" श्रीमद्भागवत (६.१४.५) में महाराज परीक्षित की शुकदेव गोस्वामी से जिज्ञासा है, "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! मैं समझता हूँ वृत्रासुर बड़ा पापात्मा था और उसकी मति रजोगुण-तमोगुण से भरी थी । फिर उसमें नारायणभक्ति का ऐसा पूर्ण विकास कैसे हुआ ? मैंने सुना है कि कठोर तपस्या करके सिद्ध और पूर्ण ज्ञानी मुक्त पुरुषों को भी भगवद्भक्त बनने का साधन करना पड़ता है । नारायणभक्त निःसन्देह बड़ा दुर्लभ है । अतः आश्चर्य है कि वृत्रासुर भक्त कैसे बन गया !” उपरोक्त श्लोक में सबसे महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि निर्विशेष ब्रह्म में लीन हुए असंख्य मुक्त पुरुषों में भी नारायणभक्त मिलना बहुत दुर्लभ है । करोड़ों मुक्तों में कोई एक भाग्यवान् ही भक्त होता है । श्रीमद्भागवत (१.८.२०) में श्रीकृष्ण को विदा करते हुए महारानी कुन्ती प्रार्थना करती हैं, “प्रभो ! बड़े-बड़े विद्वान् और परमहंस भी आपकी अगाध महिमा का पार नहीं पा सकते । जब अमल आत्मा मुनि भी आपको जान नहीं सकते तो मुझ स्त्री के लिए आपकी कीर्ति को जानना