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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु कैसे सम्भव होगा ? मैं आपको कैसे जान सकती हूँ ?" इस श्लोक से स्पष्ट है कि मुक्तपुरुष भगवान् को नहीं जान सकते, पर कुन्ती जैसे दीन भक्त उन्हें जान जाते हैं। स्त्रियाँ पुरुषों से अल्पज्ञ होती हैं, परन्तु कुन्ती देवी को भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा अनुभव हुई। श्रीमद्भागवत (१.७.१०) का 'आत्माराम' श्लोक महत्त्वपूर्ण है। इसके अनुसार प्राकृत बन्धन से पूर्ण रूप में छूटे हुए आत्माराम पुरुष भी भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं।* भाव यह है कि मुक्तजीव में विषयभोग की लेशमात्र इच्छा नहीं रहती, वह प्राकृत वासना से पूर्णतया मुक्त हो जाता है। फिर भी, वह भगवान् श्रीहरि की लीला कथा को सुनने के वशीभूत रहता है। अतएव सिद्ध होता है कि भगवद्गुण और भगवत्-लीला प्राकृत नहीं हैं। अन्यथा आत्माराम मुक्त पुरुष उनसे आकर्षित कैसे होते ? यह इस श्लोक का सार है। पूर्वोक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि भक्त किसी भी प्रकार की मुक्ति नहीं चाहता। मुक्ति के पाँच भेद हैं-१. सायुज्य : भगवान् में लीन होना; २. सालोक्य : भगवान् के लोक में वास; ३. सारूप्य : भगवान् के समान रूप की प्राप्ति; ४. सार्ष्टि : भगवान् के समान ऐश्वर्य की उपलब्धि; ५. सामीप्यः भगवान् का सांनिध्य। इन पाँचों में से सायुज्य मुक्ति को तो भक्त कभी भी स्वीकार नहीं करते। वैसे तो भक्त अन्य चारों मुक्तियों को भी नहीं लेते, परन्तु वे भक्ति के विपरीत नहीं हैं। ऐसे चार प्रकार के मुक्त पुरुषों में से कुछ में श्रीकृष्ण के लिए अनुराग उदित हो जाता है, जिससे वे भी परव्योम के गोलोक वृन्दावन धाम में प्रविष्ट हो सकते हैं। भाव यह है कि वैकुण्ठधाम में प्रविष्ट हुए चार प्रकार के भक्त पुरुष भी कभी-कभी श्रीकृष्ण में अनुरक्त होकर कृष्णलोक को गमन कर जाते हैं। इस प्रकार चार प्रकार के मुक्त भी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में बने रह सकते हैं। प्रारम्भ में उन्हें श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य की कामना हो सकती है, परन्तु परिपक्व अवस्था में वृन्दावन में प्रकट कृष्णप्रेम, जो पहले उनमें सुप्त था, फिर उनके हृदय में छा जाता है। अतएव शुद्धभक्त भक्ति

  • श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक समय सनातन गोस्वामी को इस 'आत्माराम' श्लोक की बड़ी सुन्दर व्याख्या सुनायी थी, जो लेखक के ग्रन्थ 'चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' में संकलित है।