भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
३४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के मधुररस का वास्तविक आस्वादन कर ही नहीं सकता। इसीलिए श्रील रूप गोस्वामी ने हृदय में भुक्ति-मुक्ति की इच्छाओं के होने को पिशाची बताया है; दोनों कष्टदायक हैं। भुक्ति का अर्थ विषयसुख है और मुक्ति का अभिप्राय भवबन्धन से छूटकर भगवान् से एकत्व प्राप्त करना है। ये दोनों पिशाची हैं, क्योंकि जब तक विषयसुख अथवा ब्रह्मैक्य की इच्छा रहेगी, तब तक भक्ति के यथार्थ दिव्य सुख का आस्वादन कोई नहीं कर सकता। शुद्धभक्त मुक्ति की चिन्ता कभी नहीं करता। श्रीचैतन्य महाप्रभु की श्रीकृष्ण से प्रार्थना है, "हे नन्दकुमार (श्रीकृष्ण) ! मुझे बहुत से अनु- यायियों का सुख, धन का ऐश्वर्य और सुन्दर स्त्री नहीं चाहिए और न भवबन्धन से मुक्ति का ही मैं अभिलाषी हूँ। जन्म-जन्मान्तर में आपके चरणों में मेरी अनन्यभक्ति हो, बस यही प्रार्थना है।" शुद्धभक्त का ध्यान भगवान् के नाम, गुण, रूप, लीला, धाम आदि के यशोगान में इतना आकृष्ट रहता है कि मुक्ति तक की परवाह नहीं करता। श्री बिल्वमंगल ठाकुर का उद्गार है, "हे प्राणप्रिये प्रभो ! आपकी भक्ति के परायण मुझे सर्वत्र आपकी ही स्फूर्ति होती है। ऐसे में मुक्ति मेरी सेवा के अवसर की प्रतीक्षा में द्वार पर करबद्ध खड़ी है।" शुद्धभक्तों के लिए मुक्ति अथवा ब्रह्मैक्य का कुछ भी महत्त्व नहीं है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (३.२५.३६) में भगवान् कपिल माता देवहूति को उपदेश करते हुए कहते हैं, "हे जननि ! मेरे शुद्धभक्त मेरे नाना रूपों, मेरे मुखमण्डल की माधुरी और मोहक अवयवों को देखने में मुग्ध रहते हैं। मेरा हँसना, मेरी क्रीड़ा और मेरा देखना उन्हें इतना मधुर लगता है कि उनके विचार मुझमें ही लगे रहते हैं; वरन् उनका सम्पूर्ण जीवन ही मेरे अर्पण हो जाता है। यद्यपि उन्हें किसी भी प्रकार का मोक्षसुख या प्राकृतसुख नहीं चाहिए, परन्तु मैं उन्हें अपने परमधाम में पार्षदपद दे देता हूँ।" श्रीमद्भागवत के इस प्रमाण से शुद्धभक्तों को आश्वासन मिलता है कि वे श्रीभगवान् का संग अवश्य प्राप्त करेंगे। इस सन्दर्भ में श्रील रूप गोस्वामीपाद कहते हैं कि जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों अथवा उनकी सेवा की मधुरिमा के प्रति आकृष्ट हो गया है और इस आकर्षणवश जिसका चित्त निरन्तर दिव्यसुख से ओतप्रोत रहता है, ऐसे भक्त को स्वाभाविक रूप में उस मोक्ष की कभी इच्छा नहीं होती, जो निर्विशेष- वादियों के लिए इतना महत्त्वपूर्ण है।
भक्तियोग के अधिकारी के लक्षण [ ३५ इसी के समान, तृतीय स्कन्ध (३.३.१५) में उद्धव भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है, 'प्रभो ! आपके चरणकमलों की दिव्य प्रेममयी सेवा करने वालों के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से कुछ भी प्राप्त होने योग्य नहीं रहता, यद्यपि इनसे होने वाले सुख उन्हें बड़ी सुगमता से मिल सकते हैं। फिर भी हे सर्वशक्तिमान् ! मैं आपसे मोक्ष आदि को नहीं चाहता। मुझे तो बस आपके चरणकमलों में अनन्य श्रद्धा-भक्ति ही चाहिए ।" इसी प्रकार, तृतीय स्कन्ध, अध्याय २५ के श्लोक ३१ में भगवान् कपिल कहते हैं, "हे माता ! जिनका हृदय मेरे चरणों की सेवा से ओतप्रोत है और मेरी तृप्ति के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, विशेष रूप से जो मेरे नाम, रूप, गुण और यश का संकीर्तन करते हुए दिव्य परमानन्दसिंधु में मग्न रहते हैं, वे भाग्यवान् भक्त मुझसे एक होने की कभी इच्छा नहीं करते । मुझसे एक होना तो दूर, मेरी भक्ति में तृप्त रहने वाले भक्तजन तो मेरे द्वारा दिये जाने पर भी सालोक्य, साष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्ति तक को लेना नहीं चाहते ।" श्रीमद्भागवत (४.६.१०) में ही ध्रुव महाराज कहते हैं, "हे देव ! आपके चरणकमलों का ध्यान करने से मनुष्य को जिस दिव्य सुख की प्राप्ति होती है, निर्विशेषवादियों को ब्रह्म-साक्षात्कार से उसका आभास भी नहीं हो सकता। फिर उच्च स्वर्गीय लोकों को जाने की इच्छा से सकामकर्म करने वाले आपको कैसे जान सकते हैं, और उन्हें भक्तों के समान सुखी किस प्रकार समझा जाय ।''
अध्याय ४ भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है भक्त का भगवान् की भक्ति में कितना अनुराग होता है, यह आदि- राज महाराज पृथु के वाक्य से समझा जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२०.२४) में वे कहते हैं, “हे देव ! यदि मुक्ति होने पर आपके चरण- कमलों के जयगान में शुद्ध भक्तों के हृदय से गूंजने वाली आपकी अमृतमय कीर्ति सुनने को नहीं मिलती तो मैं उस मोक्ष अथवा ब्रह्मैक्य को कभी नहीं लूंगा। मेरी तो बस निरन्तर यही प्रार्थना है कि आप मुझे असंख्य जिह्वा और कान प्रदान कीजिए, जिससे मैं सर्वदा आपकी दिव्य कीर्ति का श्रवण-कीर्तन करता हुआ परमानन्द में निमग्न रहूँ।” निर्विशेषवादी भगवान् में लीन हो जाना चाहते हैं। वे नहीं जानते कि अपना निजी स्वरूप बनाए रखे बिना जीव भगवत्-कीर्ति का श्रवण- कीर्तन नहीं कर सकता। उन्हें भगवान् के दिव्य विग्रह का कुछ भी बोध नहीं होता, इसलिए भगवान् की दिव्य लीला का श्रवण-कीर्तन वे नहीं कर सकते। भाव यह है कि मुक्ति से ऊपर उठे बिना भगवत्-कीर्ति का आस्वादन अथवा दिव्य भगवत्-विग्रह के तत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवत (५.१४.४४) में ही एक अन्य सदृश वाक्य है। शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से कह रहे हैं, “भक्तप्रवर राजा भरत श्रीकृष्ण के चरणारविन्द की सेवा में इतने अतिशय अनुरक्त थे कि उन्होंने बड़ी सुगमता से पृथ्वी पर अपने शासन तथा पुत्र, समाज, मित्र, राजऐश्वर्य और सुन्दर स्त्री के मोह को त्याग दिया। देवगण भी जिसके लिए ललचाते रहते हैं, वे लक्ष्मीदेवी तक उनपर प्रसन्न थीं। पर उन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा।” राजा भरत के इस आदर्श व्यवहार की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए शुकदेव आगे कहते हैं, “भगवान् की सेवा में जिनका मन अनुरक्त है, भोगों की तो बात ही क्या, उनके लिए तो महामुनियों द्वारा वाँछित मोक्ष भी तुच्छ हो जाता है।”
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ३७ श्रीमद्भागवत (६.११.२५) में वृत्रासुर भगवान् से कहता है, “हे भगवान् ! आपकी भक्ति को छोड़कर मैं न स्वर्गपद को, न महेन्द्रपद को, न त्रिलोकी के सार्वभौम राज्य को, न योग की सिद्धियों को और न मोक्ष को ही चाहता हूँ । मुझे तो बस आपके शाश्वत् संग और प्रेमसेवा की इच्छा है ।” इस वाक्य की पुष्टि करते हुए भगवान् शिव सती से श्रीमद्भागवत (६.१७.२८) में कहते हैं, “हे साध्वि ! नारायणभक्त किसी से नहीं डरते । स्वर्ग हो, मोक्ष हो, या नरक, उनके लिए सब समान है । भगवान् नारायण के चरणकमलों के शरणागत हो जाने मात्र से उनके लिए प्राकृत-जगत् की सभी परिस्थितियाँ एक जैसी हो जाती हैं ।” श्रीमद्भागवत (६.१८.७४) में इन्द्र अपनी माता अदिति का सम्बोधन करते हुए कहते हैं, “हे माता ! निष्कामभाव से केवल भगवान् की भक्ति करने वाले भक्तजन ही वास्तव में अपने स्वार्थ को जानते हैं । ऐसे पुरुष वास्तव में स्वार्थकुशल हैं, और जीवन की संसिद्धि की ओर उन्नति करने में परम दक्ष माने जाते हैं ।” महाराज प्रह्लाद (७.६.२५) का वचन है, “हे दैत्यमित्रो ! भगवान् के प्रसन्न होने पर संसार में क्या दुर्लभ रह सकता है ? यदि भगवान् तुष्ट हो जायें, तो तुम्हारे हृदय के सम्पूर्ण मनोरथ निस्सन्देह सिद्ध हो जायेंगे । इसलिए त्रिगुणमयी प्रकृति द्वारा अपने-आप सिद्ध होने वाले सकामकर्मों से क्या लाभ ? निरन्तर भगवत्-कीर्ति का गान करते हुए उनकी चरणमाधुरी का आस्वादन करने वाले के लिए मोक्ष से भी क्या लाभ ?” प्रह्लाद महाराज के इस वाक्य से स्पष्ट है कि जो भगवान् की दिव्य कीर्ति के श्रवण-कीर्तन में सुख का अनुभव करता है, वह सब प्रकार से प्राकृतसुखों—पुण्यकर्मों, यज्ञों और मोक्ष तक का उल्लंघन कर चुका है । इसी भाँति, सातवें स्कन्ध के अध्याय आठ, श्लोक ४२ में भगवान् नृसिंह की स्तुति करते हुए इन्द्र कहते हैं, “हे परम पुरुष ! ये दैत्य यज्ञों में हमारे भाग का अपहरण करना चाहते थे; परन्तु नृसिंह रूप से प्रकट होकर आपने महाभय से हमारा त्राण कर दिया है। वास्तव में हमारा यज्ञभाग आपसे ही है, क्योंकि आप सम्पूर्ण यज्ञों के परम भोक्ता हैं। आप जीवमात्र के अन्त- र्यामी, सबके यथार्थ स्वामी हैं। हमारे हृदय बहुत समय से इस दैत्य हिरण्यक- शिपु के भय से आक्रान्त थे; परन्तु आप हम पर इतने कृपाशील हैं कि इसे मार कर आपने हमारे हृदयों से भय को भगा दिया है और हमें अवसर
३८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु दिया है कि हम आपको अपने हृदय में फिर अभिराजित कर सकें। आपकी दिव्य प्रेममयी सेवा के परायण भक्तों के लिए वे सब ऐश्वर्य तृणतुल्य हैं जिनका दैत्यों ने हमसे अपहरण किया था। भक्त तो मोक्ष की भी चिन्ता नहीं करते, फिर इन प्राकृत ऐश्वर्यों का क्या कहना। वास्तव में यज्ञ के भोक्ता हम नहीं हैं। हे नाथ ! हमारा तो बस यही कर्तव्य है कि सदा आपकी सेवा में लगे रहें, क्योंकि आप ही सबके भोक्ता हैं।" इन्द्र के इस वाक्य का यह तात्पर्य है कि ब्रह्मा से लेकर तुच्छ चिंटि तक कोई भी जीव प्राकृत ऐश्वर्य का भोग करने के लिए नहीं है। सबको अपना सर्वस्व भगवान् को अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें अपने- आप लाभ होगा। शरीर के अंग सामग्री जुटा कर उदरपूर्ति के लिए भोजन बनाते हैं, क्योंकि उदरपूर्ति होने पर शरीर के सभी अंगों को समान रूप से लाभ होता है। इसी भाँति, सबका कर्तव्य है कि परमेश्वर श्रीकृष्ण को प्रसन्न करें। तब अपने-आप सबको सुख मिलेगा। श्रीमद्भागवत (८.३.२०) में इसी के समान, गजेन्द्र ने कहा है, "प्रभो ! आपके भक्तियोग के दिव्य सुख का मुझे अनुभव नहीं है, इसी लिए आपकी कृपा की याचना करता हूँ। वास्तव में तो महापुरुषों के चरण- कमलों की सेवा करके जो सम्पूर्ण वासनाओं से छूट चुके हैं, वे शुद्धभक्त सदा परमानन्द सिन्धु में निमग्न रहते हैं। आपके परम मंगलमय चरित्र का गान करते हुए वे संतुष्ट रहते हैं; अतः और कुछ नहीं चाहते।" स्कन्ध नौ, अध्याय ४, श्लोक ६७ में वैकुण्ठनाथ दुर्वासा से कहते हैं, "मेरी भक्ति से भरे हुए भक्तजन सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य, साष्टि और सामीप्य नामक पाँच प्रकार की मुक्ति भी नहीं चाहते; फिर अन्य विनश्वर पदार्थों की तो बात ही क्या है।" भागवत के दसवें स्कन्ध (अध्याय १६, श्लोक ३७) में नागपत्नियाँ प्रार्थना करती हैं, "हे गोविन्द ! आपके चरणसरोज की रज बड़ी अद्भुत है। जिस भाग्यवान् को यह सुलभ हो जाती है, वह न स्वर्गपद को, न सार्वभौम राज्य को, न योगसिद्धि और न मोक्ष को ही चाहता है। आपकी चरणरज का अनुरागी अन्य किसी भी सिद्धि की इच्छा नहीं करता।" दसवें स्कन्ध (अध्याय ८७, श्लोक २१) में मूर्तिमान् वेदश्रुतियाँ कहती हैं, "भगवन् ! आत्मज्ञान को जानना बड़ा कठिन है। हमें इसका बोध कराने के लिए ही आप अपने स्वयंरूप में प्रकट हुए हैं। इसी के लिए गृहसुख को त्याग कर परमहंस आचार्यों का सत्संग करने वाले भक्त आपकी भक्ति- रूप अमृत के महासागर में निमग्न रहकर मुक्ति की कामना नहीं करते।"
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ३६ इस श्लोक को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि आत्म- ज्ञान आत्मा और परमात्मा दोनों के ज्ञान का वाचक है। जीवात्मा और परमात्मा दिव्य गुणों में एक हैं, इसलिए दोनों को 'ब्रह्म' कहा जाता है। परन्तु ब्रह्म का ज्ञान बड़ा दुर्जेय है। कितने ही दार्शनिक आत्मतत्त्व को समझने का प्रयास करते हैं, पर अधिक उन्नति नहीं कर पाते। भगवद्- गीता से प्रमाणित है कि करोड़ों मनुष्यों में कोई एक आत्मतत्त्व की जिज्ञासा करता है और बहुत से जिज्ञासुओं में भी कोई एक ही भगवान् को तत्त्व से जानता है। श्लोक का तात्पर्य हुआ कि आत्मतत्त्व बड़ा कठिन है, इसलिए श्रीभगवान् स्वयं आदि रूप में प्रकट होकर अर्जुन जैसे पार्षदों को प्रत्यक्ष रूप से उपदेश करते हैं, जिससे जनसाधारण इस आत्मविद्या का लाभ उठा सके। इस श्लोक से यह भी स्पष्ट है कि मुक्ति का अर्थ सब प्राकृत सुखों को पूर्ण रूप से त्याग देना है। निर्विशेषवादी भवबन्धन की मुक्ति से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं । भक्त मुक्तिलाभ तो करते ही हैं; साथ-साथ भगवान् श्रीकृष्ण के अद्भुत चरित्र के श्रवण-कीर्तन के दिव्य आनन्द का भी रसास्वादन करते हैं। भागवत (११.२०.३४) में श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं- "हे उद्धव ! पूर्ण रूप से मेरी सेवा के आश्रित हुए भक्तजन भक्तियोग में इतने दृढ़ (अनन्य) रहते हैं कि अन्य अभिलाषाओं का उनमें बिल्कुल अभाव हो जाता है। मेरे द्वारा दिए जाने पर चार प्रकार के मोक्ष को भी वे नहीं लेते, फिर प्राकृत-जगत् की किसी वस्तु का क्या कहना है।" अन्यत्र (११.१४.१४) भी श्रीकृष्ण का कथन है, "हे उद्धव ! मेरे चिन्तन और लीला में अर्पित मन-बुद्धि वाला ब्रह्मपद, इन्द्रपद, सार्वभौम आधिपत्य, योगसिद्धि अथवा मुक्ति तक की इच्छा नहीं करता।" श्रीमद्- भागवत (१२.१०.६) में शिवजी पार्वती से कहते हैं, "देवि ! ये महान् ब्रह्मर्षि मारकण्डेय भगवान् की अनन्य श्रद्धा-भक्ति को प्राप्त हो गये हैं। इसलिए अब ये कुछ नहीं चाहते, यहाँ तक कि संसार से मुक्ति भी नहीं।" 'पद्मपुराण' के कार्तिकमाहात्म्य में इस सिद्धान्त का समर्थन है। इस समय वृन्दावन में भगवान् श्रीकृष्ण के दामोदर रूप की उपासना करने का विधान है। दामोदररूप श्रीकृष्ण की उस बाललीला का द्योतक है, जब वे माता यशोदा द्वारा बाँधे गए थे (दाम अर्थात् बंधन)। श्रीकृष्ण के चांचल्य से रुष्ट होकर यशोदा मैया ने उन्हें रस्सी से बाँधा था; इसीलिए वे दामोदर कहलाए। कार्तिक में भगवान् दामोदर से निवेदन करते हैं,
४० ] भक्तिरसामृतसिन्धु “हे प्रभो ! हे वरों के स्वामिन् ! ब्रह्मा और शिव आदि देवता हिरण्यकशिपु, रावण जैसे अपने भक्तों को बहुत से वर दिया करते हैं; परन्तु ब्रह्मा, शिव भी आपके वरों पर आश्रित हैं।” यही कारण है कि श्रीकृष्ण को वरों का स्वामी कहा गया है। वे भक्तों को कुछ भी वर दे सकते हैं; पर भक्तों की प्रार्थना है, “मुझे किसी प्राकृतसुख या मुक्ति की इच्छा नहीं है। बस इतना वर दीजिए कि आपका यह दामोदर रूप सदा मेरे हृदय में बसा रहे। आपके इस मधुर मनोहर रूप के अतिरिक्त मेरा चित्त और कुछ नहीं चाहता ।” इस प्रार्थना के अगले श्लोक में कहा है, “हे दामोदर ! एक समय नन्द महाराज के प्रांगण में चंचल क्रीड़ा करते हुए आपने दही का भाण्ड फोड़ डाला था। उस पर यशोदा मैया ने आपको रस्सी से ऊखल से बाँध दिया। तब आपने नन्दजी के आंगन में यमलार्जुन के रूप में खड़े नलक्कूवर और मणिग्रीव का उद्धार करके अपनी भक्ति का अधिकारी बनाया। कृपामयी लीला करके मुझे भी अपनी भक्ति प्रदान कीजिए, मुझे मुक्ति का आग्रह नहीं है ।” देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के दोनों पुत्र अपने पिता के ऐश्वर्य के मद में मत्त हो रहे थे। एक समय वे किसी दिव्यलोक में नग्न अप्सराओं के साथ विलासमग्न थे। तभी महामुनि नारद मार्ग से जा रहे थे। उन्हें कुबेरपुत्रों के अभद्र व्यवहार पर हार्दिक दुःख हुआ। नारदजी को जाते देखकर अप्सराओं ने तो वस्त्रधारण कर लिए, परन्तु मद्यप कुबेरपुत्रों को लज्जा नहीं आयी । उनके व्यवहार से क्रुद्ध होकर नारदजी ने शाप दिया, “तुम दोनों सर्वथा निर्लज्ज हो रहे हो, इसलिए कुबेरपुत्र होने के स्थान पर वृक्ष बन जाओ।” यह सुनने पर दोनों को चेतना हुई और नारद जी से क्षमा माँगने लगे। तब नारद ने कहा, “तुम अर्जुन के वृक्ष बन कर नन्द महाराज के आँगन में खड़े रहोगे। नन्द महाराज के पुत्ररूप में जब श्रीकृष्ण प्रकट होंगे, तब तुम्हारा उद्धार होगा।” प्रकारा- न्तर से, नारद का शाप कुबेरपुत्रों के लिए वरदान सिद्ध हुआ, क्योंकि इससे उन्हें पूर्वसूचना मिल गयी कि उनपर श्रीकृष्ण का अनुग्रह होगा। उसके बाद दोनों कुबेरपुत्र नन्दजी के घर में यमलार्जुन के रूप में खड़े रहे। कालान्तर में नारद की वाणी सत्य करने को भगवान् दामोदर ने ऊखल से पेड़ों को गिराकर उन का उद्धार किया। नलकुबर और मणिग्रीव अब तक महाभागवत बन गए थे। गिरे वृक्षों से निकलकर उन्होंने भगवान् दामोदर की अभ्यर्थना की । ‘हयशीर्ष पञ्चरात्र’ में उल्लेख है, “हे प्रभो ! हे भगवन् ! मैं धर्म’
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़ कर है [ ४१ अर्थ, काम और मोक्ष को नहीं चाहता । बस इतनी ही अभिलाषा है कि मैं सदा आपके चरणकमलों का दास बना रहूँ। कृपया मुझपर यह अनुग्रह करें ।" उसी ‘हयशीर्ष पञ्चरात्र' में उल्लेख है कि नृसिंहदेव के बारम्बार आग्रह करने पर भी प्रह्लाद महाराज ने कोई विषयवस्तु नहीं माँगी, अपितु सदा भक्ति के परायण करने का ही वर चाहा । इस सन्दर्भ में प्रह्लाद महाराज ने भगवान् रामचन्द्र के नित्यदास हनुमान् जी का उदाहरण दिया । हनुमान् ने भगवान् से कोई भी प्राकृत वरदान न माँगने का आदर्श स्थापित किया है । वे सदा भगवत्सेवा के परायण रहे । इस आदर्श गुण के लिए वे आज तक भक्तों के आराध्य हैं । प्रह्लाद महाराज ने भी हनुमान्जी का सादर अभिवादन किया । श्रीहनुमान् का प्रसिद्ध वचन है, “मैं भवबन्धन से उस मोक्ष को अथवा आप के सायुज्य को नहीं चाहता, जिसके आप प्रभु हैं और मैं आपका दास हूँ-इस भाव का लोप हो जाय ।" ‘नारदपञ्चरात्र' के एक अन्य श्लोक में कहा है, "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है । बस यही प्रार्थना है कि अपने चरणकमलों की छाया में मुझे जीने दीजिए । हे धरणीधर ! मैं सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियों को नहीं चाहता । मुझे तो केवल आपकी दया की कामना है, जिससे निरन्तर आपकी प्रेममयी सेवा के परायण रहूँ ।" श्रीमद्भागवत (६.१४.५) में महाराज परीक्षित की शुकदेव गोस्वामी से जिज्ञासा है, "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! मैं समझता हूँ वृत्रासुर बड़ा पापात्मा था और उसकी मति रजोगुण-तमोगुण से भरी थी । फिर उसमें नारायणभक्ति का ऐसा पूर्ण विकास कैसे हुआ ? मैंने सुना है कि कठोर तपस्या करके सिद्ध और पूर्ण ज्ञानी मुक्त पुरुषों को भी भगवद्भक्त बनने का साधन करना पड़ता है । नारायणभक्त निःसन्देह बड़ा दुर्लभ है । अतः आश्चर्य है कि वृत्रासुर भक्त कैसे बन गया !” उपरोक्त श्लोक में सबसे महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि निर्विशेष ब्रह्म में लीन हुए असंख्य मुक्त पुरुषों में भी नारायणभक्त मिलना बहुत दुर्लभ है । करोड़ों मुक्तों में कोई एक भाग्यवान् ही भक्त होता है । श्रीमद्भागवत (१.८.२०) में श्रीकृष्ण को विदा करते हुए महारानी कुन्ती प्रार्थना करती हैं, “प्रभो ! बड़े-बड़े विद्वान् और परमहंस भी आपकी अगाध महिमा का पार नहीं पा सकते । जब अमल आत्मा मुनि भी आपको जान नहीं सकते तो मुझ स्त्री के लिए आपकी कीर्ति को जानना
४२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु कैसे सम्भव होगा ? मैं आपको कैसे जान सकती हूँ ?" इस श्लोक से स्पष्ट है कि मुक्तपुरुष भगवान् को नहीं जान सकते, पर कुन्ती जैसे दीन भक्त उन्हें जान जाते हैं। स्त्रियाँ पुरुषों से अल्पज्ञ होती हैं, परन्तु कुन्ती देवी को भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा अनुभव हुई। श्रीमद्भागवत (१.७.१०) का 'आत्माराम' श्लोक महत्त्वपूर्ण है। इसके अनुसार प्राकृत बन्धन से पूर्ण रूप में छूटे हुए आत्माराम पुरुष भी भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं।* भाव यह है कि मुक्तजीव में विषयभोग की लेशमात्र इच्छा नहीं रहती, वह प्राकृत वासना से पूर्णतया मुक्त हो जाता है। फिर भी, वह भगवान् श्रीहरि की लीला कथा को सुनने के वशीभूत रहता है। अतएव सिद्ध होता है कि भगवद्गुण और भगवत्-लीला प्राकृत नहीं हैं। अन्यथा आत्माराम मुक्त पुरुष उनसे आकर्षित कैसे होते ? यह इस श्लोक का सार है। पूर्वोक्त वाक्यों से स्पष्ट है कि भक्त किसी भी प्रकार की मुक्ति नहीं चाहता। मुक्ति के पाँच भेद हैं-१. सायुज्य : भगवान् में लीन होना; २. सालोक्य : भगवान् के लोक में वास; ३. सारूप्य : भगवान् के समान रूप की प्राप्ति; ४. सार्ष्टि : भगवान् के समान ऐश्वर्य की उपलब्धि; ५. सामीप्यः भगवान् का सांनिध्य। इन पाँचों में से सायुज्य मुक्ति को तो भक्त कभी भी स्वीकार नहीं करते। वैसे तो भक्त अन्य चारों मुक्तियों को भी नहीं लेते, परन्तु वे भक्ति के विपरीत नहीं हैं। ऐसे चार प्रकार के मुक्त पुरुषों में से कुछ में श्रीकृष्ण के लिए अनुराग उदित हो जाता है, जिससे वे भी परव्योम के गोलोक वृन्दावन धाम में प्रविष्ट हो सकते हैं। भाव यह है कि वैकुण्ठधाम में प्रविष्ट हुए चार प्रकार के भक्त पुरुष भी कभी-कभी श्रीकृष्ण में अनुरक्त होकर कृष्णलोक को गमन कर जाते हैं। इस प्रकार चार प्रकार के मुक्त भी जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में बने रह सकते हैं। प्रारम्भ में उन्हें श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य की कामना हो सकती है, परन्तु परिपक्व अवस्था में वृन्दावन में प्रकट कृष्णप्रेम, जो पहले उनमें सुप्त था, फिर उनके हृदय में छा जाता है। अतएव शुद्धभक्त भक्ति
- श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक समय सनातन गोस्वामी को इस 'आत्माराम' श्लोक की बड़ी सुन्दर व्याख्या सुनायी थी, जो लेखक के ग्रन्थ 'चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' में संकलित है।
भक्तियोग सब मोक्षों से बढ़कर है [ ४३ के अनुकूल होने पर अन्य चारों मुक्तियों को तो कदाचित् ले भी सकते हैं, पर सायुज्य को कभी नहीं लेते । भगवान् के नाना प्रकार के भक्तों में वह सर्वोत्तम माना जाता है, जो वृन्दावन में प्रकट श्रीकृष्ण के आदिरूप पर मोहित रहता है। ऐसा भक्त वैकुण्ठलोक और श्रीकृष्ण की दिव्य नगरी द्वारका तक के ऐश्वर्य की ओर आकृष्ट नहीं होता । अस्तु, श्रील रूप गोस्वामी का निर्णय है कि भगवान् की गोकुल अथवा वृन्दावन* की लीला पर आकृष्ट भक्त सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्त भगवान् के इष्ट रूप में अनन्य रहता है। उदाहरण के लिए, रामभक्त हनुमान् जी जानते थे कि भगवान् राम और भगवान् नारायण में भेद नहीं है। फिर भी, वे केवल भगवान् राम की सेवा के ही अभिलाषी थे। इसका कारण भक्त की विशिष्ट रुचि है। भगवत्-रूप बहुत से हैं, परन्तु कृष्ण आदिरूप है। यद्यपि सभी भगवत्-रूपों के भक्त एक श्रेणी में हैं, फिर भी सब प्रकार के भक्तों में कृष्णभक्त सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- वृन्दावन वह दिव्य धाम है, जहाँ श्रीकृष्ण अपने शैशवकालीन लीला- रस का परिवेषण करते हैं। यह परमधाम है। जब यह प्राकृत-जगत् में प्रकट होता है तो इसे गोकुल कहते हैं; वैकुण्ठ-जगत् में यही गोलोक या गोलोक-वृन्दावन कहलाता है।
अध्याय ५ भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त सम्पूर्ण उपदेश का सार इस प्रकार है। जब तक विषयों की अथवा ब्रह्मज्योति में लीन होने की इच्छा है, तब तक शुद्ध भक्तियोग के मण्डल में प्रवेश नहीं हो सकता। यह प्रतिपादन करके श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि भक्तियोग सभी लौकिक विचारों से परे है और किसी राष्ट्र, जाति, समाज अथवा परिस्थिति-विशेष तक सीमित नहीं है। उसमें मनुष्यमात्र का अधिकार है। श्रीमद्भागवत में आया है कि भक्ति स्वरूप से अहैतुकी और अप्रतिहता होती है। भक्ति किसी लाभ की इच्छा के बिना की जाती है और कोई भी प्राकृत परि- स्थिति उसमें बाधा नहीं डाल सकती। उसमें भेदभाव के बिना सभी का अधिकार है; वह तो जीव का स्वरूपधर्म ही है। मध्यकाल में, भगवान् चैतन्य महाप्रभु के महान् पार्षद श्रीनित्यानन्द प्रभु के तिरोधान के बाद, पण्डितों का एक वर्ग अपने को नित्यानन्दवंशी गोस्वामी जाति कहने लगा। उनका दावा था कि भक्ति के साधन और प्रचार का अधिकार केवल उन्हीं का है। इस प्रकार कुछ समय तक उनका यह मिथ्या एकाधिकार चलता रहा। परन्तु गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के महान् आचार्य श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उनके इस विचार को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया। पहले बड़ा गंभीर संघर्ष हुआ, पर अन्त में वे सफल रहे और अब यह ठीक-ठीक वास्तव में सिद्ध हो गया है कि भक्ति का अधिकार किसी जाति-विशेष तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त, भक्तिपरायण व्यक्ति ब्राह्मण के पद को अपने-आप प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार भक्ति आन्दोलन के लिए श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का संघर्ष सफल रहा है। उनके इस सिद्धान्त के आधार पर विश्व का अथवा ब्रह्माण्ड का कोई भी प्राणी गौड़ीय वैष्णव बन सकता है। जो कोई शुद्ध वैष्णव बन जाता है, वह शुद्धसत्त्व में स्थित हो जाता है, इसलिए प्राकृत-जगत् की सर्वोत्तम पात्रता-सत्त्वगुण में स्थिति उसे अपने-आप प्राप्त रहती है।
भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप [ ४५
पाश्चात्य जगत् में हमारा कृष्णभावनामृत आन्दोलन हमारे गुरुमहाराज श्रील भक्तिसिद्धान्त गोस्वामी प्रभुपाद के इसी सिद्धान्त पर आधारित है । उसके प्रमाण के बल पर हम पाश्चात्य देशों के सभी वर्गों में ब्राह्मण बना रहे हैं। नामधारी ब्राह्मण विरोध करते हैं कि जिसका जन्म ब्राह्मण- जाति में नहीं हुआ हो, उसे यज्ञोपवीत धारण नहीं कराया जा सकता और न वह उत्तम वैष्णव बन सकता है । परन्तु हम इस मत को नहीं मानते क्योंकि यह श्रील रूप गोस्वामी अथवा विविध शास्त्रों द्वारा प्रमाणित नहीं होता । श्रील रूप गोस्वामी ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि भक्तियोग को अंगीकार कर कृष्णभावनाभावित हो जाने का मनुष्यमात्र को जन्म- सिद्ध अधिकार है। उन्होंने नाना शास्त्रों से अनेक प्रमाण उपस्थित किए हैं; विशेष रूप से पद्मपुराण से एक उद्धरण दिया है, जिसमें वशिष्ठ ऋषि महाराज दिलीप से कहते हैं, "हे राजन् ! माघस्नान के समान भक्ति में भी मनुष्यमात्र का अधिकार है।" पद्मपुराण के काशीखण्ड में और भी प्रमाण हैं, "मयूरध्वज नामक देश में अन्त्यजों को भी भक्ति की वैष्णव दीक्षा दी जाती है। जब वे शरीर पर तिलक तथा कण्ठ और हाथ में कण्ठी- माला धारण करते हैं, तो साक्षात् वैकुण्ठ से आये लगते हैं । वास्तव में उनकी शोभा साधारण ब्राह्मणों से कहीं अधिक होती है।" अतः वैष्णव ब्राह्मणपद को पहले ही प्राप्त हो जाता है । वैष्णवों की आचारसंहिता 'हरिभक्तिविलास' में सनातन गोस्वामी ने भी इस विचार का समर्थन किया है। उनका स्पष्ट वाक्य है कि विधि-विधान से वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित पुरुष निस्सन्देह ब्राह्मण हो जाता है, उसी प्रकार जैसे पारे के मिश्रण से कांसा भी स्वर्ण बन जाता है । आचार्यों का अनुगामी सद्गुरु किसी को भी वैष्णव दीक्षा दे सकता है, जिससे शिष्य स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणश्रेष्ठ बन जाता है । श्रील रूप गोस्वामी की साथ-साथ चेतावनी है कि सद्गुरु का दीक्षित शिष्य यह न समझे कि दीक्षा मात्र से वह कृतकार्य हो गया है। विधि-विधान का दृढतापूर्वक पालन तब भी बड़ा आवश्यक है। यदि कोई गुरु से दीक्षा ग्रहण करके भक्ति की विधि का अनुसरण नहीं करता, तो फिर गिर जाता है। सावधानीपूर्वक सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य विग्रह का भिन्न-अंश है, अतः उसका कर्तव्य बनता है कि पूर्ण परात्पर श्रीकृष्ण की सेवा करे । यदि हम श्रीकृष्ण की सेवा में प्रमाद करेंगे तो फिर गिर जायेंगे । भाव यह है कि केवल दीक्षित
४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हो जाने से ही उच्च ब्राह्मणपद नहीं मिलता। बड़ी दृढ़ता से कर्तव्य और विधि का पालन करना परम आवश्यक है। श्रील रूप गोस्वामी कहते है कि यदि कोई नियमित रूप से भक्ति- योग के परायण रहे तो गिरने का कोई भय नहीं रहता। परन्तु यदि प्रसंगवश पतन हो जाय, तो भी वैष्णव को प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं। दैवात् भक्तिसिद्धान्त से गिरकर निषिद्ध आचरण कर बैठने पर भी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करना कर्तव्य नहीं है। भक्ति के विधि-विधान का पालन करने से ही अपनी स्थिति फिर प्राप्त हो जाती है। यह वैष्णव-शास्त्रों का रहस्य है। वस्तुतः अध्यात्म चेतना के तीन मार्ग हैं-कर्म, ज्ञान और भक्ति। भक्तियोग का कर्मकाण्ड अथवा मनोधर्ममय ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं। कहा जा चुका है कि शुद्धभक्ति में ज्ञान-कर्म का लेश भी नहीं रहता। वह उनसे सर्वथा शुद्ध होती है। इस संदर्भ में श्रील रूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत से प्रमाण देते हैं। एकादश स्कन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा है, "गुण-दोष का निर्णय इस प्रकार किया जा सकता है। भक्तियोगी पुरुष फिर कभी सकाम कर्म अथवा मनोधर्म का आश्रय नहीं लेते। आचार्यों और शास्त्रों के विधि-विधान का अनुसरण करते हुए भक्ति में निष्ठ रहना सर्वोपरि गुण है।" श्रीमद्भागवत (१.५.१७) में अन्यत्र भी इस वाक्य की पुष्टि है। नारदजी ने व्यासदेव से कहा, "जो अपने स्वधर्म को त्याग कर साक्षात् भगवान् हरि के चरणकमलों के आश्रित हो जाता है, उसका कभी अनिष्ट नहीं होता और सब अवस्थाओं में उसकी स्थिति सुरक्षित रहती है। यदि दुःसंग के कारण वह भक्ति से गिर भी जाय, अथवा भक्तिसाधन के पूरा होने से पहले ही मर जाय, तों भी उसे हानि नहीं होगी। दूसरी ओर, जो मनुष्य कृष्णभावना के बिना वर्णाश्रमधर्म का पालन करता है, उसे मानव- जीवन का यथार्थ लाभ नहीं होता। तात्पर्य यह है कि जो जीव यह जाने बिना कि सकामकर्मों के द्वारा भवबन्धन दूर नहीं हो सकता, उन्मत्त की भाँति इन्द्रियतृप्ति की क्रियाओं में ही लगे रहते हैं, उन्हें बारम्बार जन्म- मृत्यु के चक्र में फेंका जायगा। श्रीमद्भागवत के पाँचवे स्कन्ध में भगवान् ऋषभदेव का पुत्रों को उपदेश है, "सकामकर्मों जन्म-मृत्यु के बन्धन में ही फँसे रहते हैं। जब तक उनमें भगवान् वासुदेव के लिए प्रेमभाव का उदय नहीं होता, तब तक
भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप [ ४७ इस दृढ बन्धन से नहीं छूट सकते ।'' अस्तु, जो मनुष्य बड़ी गंभीरता से अपने वर्णाश्रमधर्म का अनुसरण तो करता है, परन्तु भगवान् वासुदेव से प्रेम नहीं करता, वह अपना मनुष्यजीवन व्यर्थ गवाँता है। श्रीमद्भागवत (११.११.३२) में इस की पुष्टि करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे उद्धव ! जो पुरुष अन्य सब कर्तव्यों को त्यागकर पूर्णरूप से शरणागत हुआ मेरे आश्रित हो जाता है और मेरा आज्ञापालन करता है, वह सर्वश्रेष्ठ है।" इस भगवत्-वचन से स्पष्ट है कि दातव्य, नैतिक, परहितवादी, राजनीतिक और समाजकल्याण क्रियाओं में रुचि वाले मनुष्य प्राकृत-जगत् की दृष्टि में उत्तम हो सकते हैं। श्रीमद्- भागवत जैसे प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों के अनुसार तो जो पुरुष भक्तियोग से युक्त होकर केवल कृष्णभावनाभावित कर्म करता है, वह इन सब से कहीं उत्तम है। यही सिद्धान्त अन्यत्र (११.५.४१) और अधिक दृढ़तापूर्वक स्थापित किया गया है। करभाजन मुनि राजा निमि को सम्बोधित करते हैं, "हे राजन ! जो अपने वर्णाश्रमधर्म को त्याग कर सर्वभाव से भगवान् मुकुन्द के चरणकमलों के शरणागत हो जाता है, वह न तो किसी का ऋणी रहता है और न ऋषि, पितर, जीवसमुदाय, परिवार अथवा समाज के प्रति उसका कोई भी कर्तव्य शेष रहता है। पापों से मुक्ति के लिए उसे पँचयज्ञों से कोई प्रयोजन नहीं। केवल भवित करने से वह कृतकृत्य हो जाता है।" इस संसार में जन्म लेते ही मनुष्य बहुत से प्राणियों का ऋणी हो जाता है, वह ऋषियों का ऋणी है, क्योंकि उनके ग्रन्थों से लाभ उठता है। उदाहरण के लिए, हम सब व्यासप्रणीत ग्रन्थों से लाभान्वित होते हैं। व्यासदेव ने सम्पूर्ण वेदों का संकलन किया। उनसे पूर्व शिष्यगण वैदिकमन्त्रों को श्रौतपरम्परा से सुनकर कण्ठ कर लेते थे। उस समय पठन नहीं था। परन्तु कलियुग में लोगों की स्मरणशक्ति मंद हो जाती है, वे गुरु के सम्पूर्ण उपदेश की स्मृति नहीं रख सकते। अतः व्यासदेव ने वेदों को लिखित रूप देने की सोची। इसी प्रेरणा से उन्होंने वैदिक ज्ञानग्रन्थों के रूप में पुराण, वेदान्तसूत्र, महाभारत तथा श्रीमद्भागवत की रचना की। शंकराचार्य, गौतम, नारद, आदि ऋषियों के भी हम ऋणी हैं क्योंकि उनकी विद्या का उपयोग करते हैं। इसी प्रकार जन्म, सम्पत्ति आदि के लिए अपने कुलपितरों के भी हम ऋणी हैं। इसीलिए पितरों को पिण्ड का दान किया जाता है। देवताओं, जनसाधारण, बन्धु-बाँधवों को तथा गाय और कुत्ते जैसे सेवक पशुओं का भी हम पर ऋण है। हमारा कर्तव्य
४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु बनता है कि सेवा करके इन सब ऋणों का शोधन करें । परन्तु यदि कोई सब कर्तव्यों को त्याग कर अनन्यभाव से भगवान् हरि के शरणागत हो जाय तो भक्तियोग की एक चोट ही में वह किसी का भी ऋणी या किंकर नहीं रहता । भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं, "अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों को त्याग कर एक मेरे शरणागत हो जा ! मैं शपथ खाता हूँ कि तेरी सब पापों से रक्षा करूँगा ।" कोई सोच सकता है कि यदि मैं भगवान् के शरणागत हो जाऊँगा तो अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकूँगा । परन्तु भगवान् बारम्बार आश्वासन देते हैं, "संकोच न कर । मत समझ कि अन्य कर्तव्यों को त्याग देने से तेरा जीवन दोषयुक्त हो जायगा । ऐसा मत समझ । मैं तेरा सब प्रकार से संरक्षण करूँगा ।” भगवद्गीता में यह भगवान् श्रीकृष्ण का वचन है । 'अगस्त्यसंहिता' में भी प्रमाण उपलब्ध है—"जिस प्रकार शास्त्र के विधि-निषेध मुक्तपुरुष पर नहीं लगते, वैसे ही रामोपासकों को पुराणों के विधि-विधान स्पर्श नहीं कर सकते ।” भाव यह है कि भगवान् राम अथवा कृष्ण के उपासक मुक्त हो जाते हैं; अतः उनके लिए वैदिकशास्त्रों के कर्मकाण्ड में वर्णित विधान का अनुसरण आवश्यक नहीं है । श्रीमद्भागवत, एकादश स्कन्ध के पाँचवें अध्याय में करभाजन मुनि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! देवों की उपासना को छोड़कर जो पूर्ण रूप से भगवान् की भक्ति के परायण हो गया है, वह भक्त उनका अतिशय प्रेमभाजन बन जाता है । इसलिए यदि प्रसंगवश अथवा भूल से उसके द्वारा कोई निषिद्ध कर्म बन जाय तो भी किसी प्रायश्चित की आवश्यकता नहीं । हृदय में बैठे हुए श्रीहरि उसके प्रासंगिक पतन पर दया करके अन्तर से उसका मार्जन कर देते हैं ।” भगवद्गीता में बहुधा कहा है कि भगवान् श्रीकृष्ण विशेष रूप से भक्तवत्सल हैं । श्रीकृष्ण की घोषणा है कि उनके भक्तों का किसी भी कारण से आत्मपतन नहीं हो सकता । वे निरन्तर उनका संरक्षण करते हैं ।
अध्याय ६ भक्ति के साधन श्रील रूप गोस्वामी का उल्लेख है कि उनके अग्रज सनातन गोस्वामी ने वैष्णवों के मार्गदर्शन के लिए 'हरिभक्तिविलास' का संकलन करके वैष्णवों द्वारा आचरण के योग्य अनेक विधि-विधानों का वर्णन किया है। उनमें से कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण और प्रमुख हैं, जिनका अब वे पाठकों के लाभ के लिए उल्लेख करेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि रूप गोस्वामी विशदीकरण के बिना केवल मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना चाहते हैं। उदाहरणार्थ, गुरु का आश्रय लेना एक मुख्य सिद्धान्त है। परन्तु ठीक किस प्रकार गुरु का आज्ञापालन करना है, यह उस मूल सिद्धान्त का विवरण हुआ। जैसे कोई एक गुरु के उपदेश का अनुसरण करता है और वह उपदेश दूसरे गुरु की शिक्षा से भिन्न हो, तो इसे विवरणात्मक जानकारी कहा जायगा। विवरण में चाहे भेद हो, परन्तु गुरु-शरणागति का मूल सिद्धान्त सभी अवस्थाओं में लागू होता है। श्रील रूप गोस्वामी विस्तृत विवरण में न जाकर केवल सिद्धान्त-प्रतिपादन करना चाहते हैं। उन्होंने भक्ति के निम्नलिखित अंग कहे हैं—१. सद्गुरु के चरण- कमलों का आश्रय ग्रहण करना; २. गुरु से कृष्णदीक्षा और भक्तियोग की शिक्षा लेना; ३. श्रद्धाभाव से गुरुसेवा (आज्ञापालन); ४. गुरुनिर्देश के अनुसार आचार्यों के पथ का अनुगमन; ५. कृष्णभावना में उन्नति के लिए गुरु से जिज्ञासा; ६. श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए भोगादि का त्याग (इसका अर्थ यह है कि जब हम कृष्णभक्ति में लगें, तो अपनी किसी प्रियवस्तु को त्यागें और किसी अप्रिय नियम को अंगीकार करें); ७. द्वारका, वृन्दावन आदि में निवास; ८. प्राकृत-जगत् से केवल आवश्यकता भर व्यवहार करना; ६. एकादशी व्रतपालन; १०. आमलक, अश्वत्थ आदि पुण्य वृक्षों का पूजन । ये दस अंग विधिभक्ति के अनुष्ठान का आरम्भ करने के लिए
५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु आवश्यक हैं। प्रारंभिक दशा में इन दसों अंगों का पालन करने से कनिष्ठ भक्त शीघ्र कृष्णभावना में पर्याप्त उन्नति कर लेगा । अगले दस अंग ये हैं—१. जो भगवान् से विमुख हों उनका दूर से ही संगत्याग; २. भक्तियोग में रुचि न रखनेवाले को उपदेश न करे; ३. विशाल मन्दिर-मठ बनाने के लिए अधिक उद्यम न करे; ४. अधिक ग्रन्थों का अध्ययन न करे तथा श्रीमद्भागवत और भगवद्गीता की कथा को आय का साधन न बनाये; ५. व्यवहार में प्रमाद न करे; ६. हानि-लाभ में दुःख-सुख से अभिभूत न हो; ७. देवताओं का अपमान न करे; ८. किसी भी जीव को न सताये; ९. सेवा और नाम के अपराधों से बचे; १०. श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की निन्दा को कभी न सहन करे । उपरोक्त दस 'अंगों' का पालन किए बिना साधनभक्ति की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती । कुल मिलाकर श्रील रूप गोस्वामी ने बीस साधन बताएं हैं। ये सभी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। बीस में से पहले तीन—गुरुपाद- आश्रय, दीक्षा और श्रद्धाभाव सहित गुरुसेवा का प्रधान महत्त्व है। आगे अतिरिक्त साधन हैं : १. शरीर पर वैष्णवचिह्न, तिलकधारण करना (भाव यह है कि जब कोई वैष्णव के शरीर पर इन चिह्नों को देखेगा, तो उसे तत्काल कृष्णस्मृति होगी । श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि वैष्णव वह है, जिसके दर्शन से श्रीकृष्ण की स्मृति हो; अतः यह आवश्यक है कि दूसरों को श्रीकृष्ण का स्मरण कराने के लिए वैष्णव शरीर पर तिलक लगाये); २. शरीर पर 'हरेकृष्ण' धारण करना; ३. भगवत्-मूर्ति और गुरुदेव को अर्पित हार-पुष्प को शरीर पर ग्रहण करना; ४. मूर्ति के आगे नृत्य करना; ५. मूर्ति अथवा गुरु को देखते ही दण्डवत् प्रणाम करना; ६. खड़े होकर स्वागत करना; ७. मार्ग में मूर्ति की शोभायात्रा के पीछे- पीछे चलना (इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि आज भी अनेक मन्दिरों में, विशेषतः विष्णुमन्दिरों में यह प्रथा है कि मन्दिर में स्थापित बड़ी अचल मूर्ति के अतिरिक्त दूसरी छोटी मूर्तियाँ भी रहती हैं, जिन्हें सांध्य- काल में शोभायात्रा पर ले जाया जाता है । कुछ मन्दिरों में सांध्य में बड़ी शोभायात्रा की परिपाटी है, जिसमें नगाड़े बजते हैं, चँवर डूलाये जाते हैं और मूर्ति को पालकी में सिंहासन पर विराजित किया जाता है, जिसे भक्तजन धारण करते हैं। मूर्तियाँ मार्ग में निकलती हैं और आसपास के लोग प्रसाद लेने आते हैं। सब मूर्ति के पीछे-पीछे चलते हैं। बड़ा सुन्दर दृश्य होता है । मूर्ति को बाहर निकालते समय मन्दिर के सेवक उनके समक्ष आय-व्यय का पूरा ब्योरा रखते हैं। भाव यह है कि भगवत्-मूर्ति को
सारे संस्थान का अधिपति समझा जाता है और सब पुजारी और संचालक उनके सेवक माने जाते हैं। अतिपुरातन होने पर भी यह प्रथा अद्यावधि चल रही है। अतः यहाँ कहा गया है कि श्रीमूर्र्ति की शोभायात्रा का अनुव्रजन करे) ८. भक्त को प्रातः और सांयकाल दिन में कम से कम दो बार विष्णुमन्दिर अवश्य जाना चाहिए। (वृन्दावन में इस पद्धति का पालन बड़ी दृढ़ता से किया जाता है। सभी भक्त प्रातः-सायं विविध मन्दिरों में दर्शनों के लिए जाते हैं। इसलिए दोनों समय मन्दिरों में बहुत भीड़ हो जाती है। वृन्दावन में लगभग ५००० मन्दिर हैं। अवश्य ही सब मन्दिरों में नहीं जाया जा सकता; परन्तु ऐसे प्रायः बारह मन्दिर हैं, जिन्हें गोस्वामियों ने स्थापित किया था। उनमें अवश्य जाना चाहिए) ६. मन्दिर की कम से कम तीन बार परिक्रमा करे (प्रत्येक मन्दिर में परिक्रमा का मार्ग रहता है। भक्त अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दस-पन्द्रह या अधिक परिक्रमा करते हैं। गोस्वामीगण गोवर्धन पर्वत की प्रदक्षिणा करते थे) सम्पूर्ण वृन्दावन धाम की परिक्रमा भी करनी चाहिए; १०. मन्दिर में मूर्ति की विधि से अर्चना करनी चाहिए (आरति, भोग, शृंगार आदि का नियम-पालन); ११. अर्चाविग्रह की परिचर्या (सेवा); १२. गाना; १३. संकीर्तन, १४. जप; १५. प्रार्थना; १६. स्तवपाठ; १७ महाप्रसाद का आस्वादन करना; १८. चरणामृतपान; १६. मूर्ति को अर्पित धूप और पुष्प की सुगन्ध को ग्रहण करना; २०. श्रीमूर्र्ति के चरणकमलों का स्पर्श करना; २१. भक्तिभाव से श्रीमूर्र्तिदर्शन करना; २२. समय-समय पर आरति करना; २३. श्रीमद्भागवत, गीता, आदि ग्रन्थों से भगवत्कथा सुनना, २४. श्रीमूर्र्ति से कृपा की याचना करना; २५. श्रीमूर्र्ति का स्मरण करना; २६. श्रीमूर्र्ति का ध्यान करना; २७, सेवा करना; २८. श्रीभगवान् के साथ सखाभाव; २६. सर्वस्व अर्पण कर देना; ३०. अपने प्रिय भोजन, वस्त्र आदि का भगवान् को अर्पण; ३१. श्रीकृष्ण के लिए सम्पूर्ण चेष्टा करना, सब संकट सहना; ३२. सब अवस्थाओं में पूर्ण रूप से भगवान् के शरणागत रहना; ३३. तुलसी को जल में सींचना; ३४. श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को नियमित रूप से सुनना; ३५. मथुरा, वृन्दावन, द्वारका आदि धामों में वास; ३६. वैष्णवों की सेवा करना, ३७. वैभव के अनुसार भक्तियोग करना; ३८ कार्तिक आदि में विशेष सेवा का आयोजन; ३६. जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन करना; ४०. विशेष श्रद्धा और भक्ति से श्रीमूर्र्ति के चरणकमलों की सेवा करना; ४१. केवल रसिकों के साथ श्रीमद्भागवत का आस्वादन करना; ४२. अपने से उत्तम
५२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सजातीय भक्तों का सत्संग करना; ४३. कृष्णनाम का कीर्तन करना; ४४. मथुरामण्डल में रहना । इस प्रकार ये सब सम्मिलित रूप से चौंसठ अंग हैं। जैसे कहा गया है, पहले दस विधान भक्ति में प्रारम्भिक हैं । इसके बाद दस और अंग हैं; चौवालिस अतिरिक्त अंग हैं। अस्तु, साधनविधिभक्ति के कुल चौंसठ साधन हैं। इनमें से अर्चन, श्रीमद्भागवत-श्रवण, भक्तों का सत्संग, नाम- संकीर्तन तथा मथुरावास—ये पाँच प्रधान हैं। भक्ति के उपरोक्त चौंसठ साधनों में कायिक, वाचिक और मानसिक—सब क्रियायें आ जाती हैं। पूर्वकथन के अनुसार यह भक्ति की विधि है कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भगवत्सेवा के परायण हों। यह कैसे किया जाय, इसके प्रकार का निरूपण इन चौंसठ साधनों में है। इसके बाद श्रील रूप गोस्वामी नाना शास्त्रों से इनमें से कतिपय साधनों के प्रमाण प्रस्तुत करेंगे ।
अध्याय ७ भक्ति के अंगों के प्रमाण सद्गुरु-पादाश्रय श्रीमद्भागवत (११.३.२१) में प्रबुद्ध महाराज निमि से कहते हैं, "हे राजन् ! निश्चित जानो कि प्राकृत-जगत् में लेशमात्र भी सुख नहीं है। इस दुःखमय स्थान में सुख की प्रतीति भ्रममात्र है। यथार्थ सुख का जिज्ञासु सद्गुरु को ढूंढे और दीक्षा के द्वारा उनका आश्रय ले। गुरु वही बनने योग्य है, जो स्वयं युक्ति और विमर्श द्वारा शास्त्रों के सिद्धान्तों में निष्णात् हो और दूसरों को भी इन सिद्धान्तों में निष्ठ कर सके। जो सम्पूर्ण सांसारिक कामनाओं का त्याग कर भगवान् के शरणागत हो गए हैं, वे महापुरुष ही सद्गुरु हैं। मनुष्यजीवन परमानन्द की प्राप्ति के लिए है। अतः सभी को सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति को गुरु न बनाए जो महामूर्ख हो, जिसे शास्त्र की आज्ञा का ज्ञान न हो, जिसका चरित्र संदिग्ध हो, जो भक्ति की विधि को न मानता हो, अथवा जिसने छः इन्द्रियतृप्ति के साधनों को जीत न लिया हो। ये छः साधन हैं: जिह्वा, उपस्थ, उदर, क्रोध, मान और वाणी। जिसने इन छहों को वश में करने का अभ्यास किया है, वह सम्पूर्ण जगत् में शिष्य बना सकता है। ऐसे गुरु का आश्रय आध्यात्मिक जीवन में सम्पूर्ण उन्नति का आधार है। सद्गुरु के आश्रय में आने वाला भाग्यवान् निश्चित रूप से भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। गुरु से कृष्णदीक्षा तथा भक्ति का उपदेश ग्रहण प्रबुद्ध मुनि ने राजा से आगे कहा, "हे राजन् ! शिष्य गुरु को केवल गुरु ही नहीं समझे; वरन् उन्हें श्रीभगवान् और परमात्मा का रूप समझना चाहिए। भाव यह है कि शिष्य गुरु को भगवान् का रूप समझे, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के बाह्य प्रकाश हैं।" सभी शास्त्रों से यह प्रमाणित है कि शिष्य गुरु को इसी रूप में माने। गुरुदेव के लिए पूर्ण श्रद्धा और