भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तियोग का शुद्ध स्वरूप [ ४७ इस दृढ बन्धन से नहीं छूट सकते ।'' अस्तु, जो मनुष्य बड़ी गंभीरता से अपने वर्णाश्रमधर्म का अनुसरण तो करता है, परन्तु भगवान् वासुदेव से प्रेम नहीं करता, वह अपना मनुष्यजीवन व्यर्थ गवाँता है। श्रीमद्भागवत (११.११.३२) में इस की पुष्टि करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे उद्धव ! जो पुरुष अन्य सब कर्तव्यों को त्यागकर पूर्णरूप से शरणागत हुआ मेरे आश्रित हो जाता है और मेरा आज्ञापालन करता है, वह सर्वश्रेष्ठ है।" इस भगवत्-वचन से स्पष्ट है कि दातव्य, नैतिक, परहितवादी, राजनीतिक और समाजकल्याण क्रियाओं में रुचि वाले मनुष्य प्राकृत-जगत् की दृष्टि में उत्तम हो सकते हैं। श्रीमद्- भागवत जैसे प्रामाणिक वैदिक शास्त्रों के अनुसार तो जो पुरुष भक्तियोग से युक्त होकर केवल कृष्णभावनाभावित कर्म करता है, वह इन सब से कहीं उत्तम है। यही सिद्धान्त अन्यत्र (११.५.४१) और अधिक दृढ़तापूर्वक स्थापित किया गया है। करभाजन मुनि राजा निमि को सम्बोधित करते हैं, "हे राजन ! जो अपने वर्णाश्रमधर्म को त्याग कर सर्वभाव से भगवान् मुकुन्द के चरणकमलों के शरणागत हो जाता है, वह न तो किसी का ऋणी रहता है और न ऋषि, पितर, जीवसमुदाय, परिवार अथवा समाज के प्रति उसका कोई भी कर्तव्य शेष रहता है। पापों से मुक्ति के लिए उसे पँचयज्ञों से कोई प्रयोजन नहीं। केवल भवित करने से वह कृतकृत्य हो जाता है।" इस संसार में जन्म लेते ही मनुष्य बहुत से प्राणियों का ऋणी हो जाता है, वह ऋषियों का ऋणी है, क्योंकि उनके ग्रन्थों से लाभ उठता है। उदाहरण के लिए, हम सब व्यासप्रणीत ग्रन्थों से लाभान्वित होते हैं। व्यासदेव ने सम्पूर्ण वेदों का संकलन किया। उनसे पूर्व शिष्यगण वैदिकमन्त्रों को श्रौतपरम्परा से सुनकर कण्ठ कर लेते थे। उस समय पठन नहीं था। परन्तु कलियुग में लोगों की स्मरणशक्ति मंद हो जाती है, वे गुरु के सम्पूर्ण उपदेश की स्मृति नहीं रख सकते। अतः व्यासदेव ने वेदों को लिखित रूप देने की सोची। इसी प्रेरणा से उन्होंने वैदिक ज्ञानग्रन्थों के रूप में पुराण, वेदान्तसूत्र, महाभारत तथा श्रीमद्भागवत की रचना की। शंकराचार्य, गौतम, नारद, आदि ऋषियों के भी हम ऋणी हैं क्योंकि उनकी विद्या का उपयोग करते हैं। इसी प्रकार जन्म, सम्पत्ति आदि के लिए अपने कुलपितरों के भी हम ऋणी हैं। इसीलिए पितरों को पिण्ड का दान किया जाता है। देवताओं, जनसाधारण, बन्धु-बाँधवों को तथा गाय और कुत्ते जैसे सेवक पशुओं का भी हम पर ऋण है। हमारा कर्तव्य