भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु बनता है कि सेवा करके इन सब ऋणों का शोधन करें । परन्तु यदि कोई सब कर्तव्यों को त्याग कर अनन्यभाव से भगवान् हरि के शरणागत हो जाय तो भक्तियोग की एक चोट ही में वह किसी का भी ऋणी या किंकर नहीं रहता । भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं, "अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों को त्याग कर एक मेरे शरणागत हो जा ! मैं शपथ खाता हूँ कि तेरी सब पापों से रक्षा करूँगा ।" कोई सोच सकता है कि यदि मैं भगवान् के शरणागत हो जाऊँगा तो अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकूँगा । परन्तु भगवान् बारम्बार आश्वासन देते हैं, "संकोच न कर । मत समझ कि अन्य कर्तव्यों को त्याग देने से तेरा जीवन दोषयुक्त हो जायगा । ऐसा मत समझ । मैं तेरा सब प्रकार से संरक्षण करूँगा ।” भगवद्गीता में यह भगवान् श्रीकृष्ण का वचन है । 'अगस्त्यसंहिता' में भी प्रमाण उपलब्ध है—"जिस प्रकार शास्त्र के विधि-निषेध मुक्तपुरुष पर नहीं लगते, वैसे ही रामोपासकों को पुराणों के विधि-विधान स्पर्श नहीं कर सकते ।” भाव यह है कि भगवान् राम अथवा कृष्ण के उपासक मुक्त हो जाते हैं; अतः उनके लिए वैदिकशास्त्रों के कर्मकाण्ड में वर्णित विधान का अनुसरण आवश्यक नहीं है । श्रीमद्भागवत, एकादश स्कन्ध के पाँचवें अध्याय में करभाजन मुनि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! देवों की उपासना को छोड़कर जो पूर्ण रूप से भगवान् की भक्ति के परायण हो गया है, वह भक्त उनका अतिशय प्रेमभाजन बन जाता है । इसलिए यदि प्रसंगवश अथवा भूल से उसके द्वारा कोई निषिद्ध कर्म बन जाय तो भी किसी प्रायश्चित की आवश्यकता नहीं । हृदय में बैठे हुए श्रीहरि उसके प्रासंगिक पतन पर दया करके अन्तर से उसका मार्जन कर देते हैं ।” भगवद्गीता में बहुधा कहा है कि भगवान् श्रीकृष्ण विशेष रूप से भक्तवत्सल हैं । श्रीकृष्ण की घोषणा है कि उनके भक्तों का किसी भी कारण से आत्मपतन नहीं हो सकता । वे निरन्तर उनका संरक्षण करते हैं ।