भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ भक्ति के साधन श्रील रूप गोस्वामी का उल्लेख है कि उनके अग्रज सनातन गोस्वामी ने वैष्णवों के मार्गदर्शन के लिए 'हरिभक्तिविलास' का संकलन करके वैष्णवों द्वारा आचरण के योग्य अनेक विधि-विधानों का वर्णन किया है। उनमें से कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण और प्रमुख हैं, जिनका अब वे पाठकों के लाभ के लिए उल्लेख करेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि रूप गोस्वामी विशदीकरण के बिना केवल मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करना चाहते हैं। उदाहरणार्थ, गुरु का आश्रय लेना एक मुख्य सिद्धान्त है। परन्तु ठीक किस प्रकार गुरु का आज्ञापालन करना है, यह उस मूल सिद्धान्त का विवरण हुआ। जैसे कोई एक गुरु के उपदेश का अनुसरण करता है और वह उपदेश दूसरे गुरु की शिक्षा से भिन्न हो, तो इसे विवरणात्मक जानकारी कहा जायगा। विवरण में चाहे भेद हो, परन्तु गुरु-शरणागति का मूल सिद्धान्त सभी अवस्थाओं में लागू होता है। श्रील रूप गोस्वामी विस्तृत विवरण में न जाकर केवल सिद्धान्त-प्रतिपादन करना चाहते हैं। उन्होंने भक्ति के निम्नलिखित अंग कहे हैं—१. सद्गुरु के चरण- कमलों का आश्रय ग्रहण करना; २. गुरु से कृष्णदीक्षा और भक्तियोग की शिक्षा लेना; ३. श्रद्धाभाव से गुरुसेवा (आज्ञापालन); ४. गुरुनिर्देश के अनुसार आचार्यों के पथ का अनुगमन; ५. कृष्णभावना में उन्नति के लिए गुरु से जिज्ञासा; ६. श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए भोगादि का त्याग (इसका अर्थ यह है कि जब हम कृष्णभक्ति में लगें, तो अपनी किसी प्रियवस्तु को त्यागें और किसी अप्रिय नियम को अंगीकार करें); ७. द्वारका, वृन्दावन आदि में निवास; ८. प्राकृत-जगत् से केवल आवश्यकता भर व्यवहार करना; ६. एकादशी व्रतपालन; १०. आमलक, अश्वत्थ आदि पुण्य वृक्षों का पूजन । ये दस अंग विधिभक्ति के अनुष्ठान का आरम्भ करने के लिए