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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

५० ] भक्तिरसामृतसिन्धु आवश्यक हैं। प्रारंभिक दशा में इन दसों अंगों का पालन करने से कनिष्ठ भक्त शीघ्र कृष्णभावना में पर्याप्त उन्नति कर लेगा । अगले दस अंग ये हैं—१. जो भगवान् से विमुख हों उनका दूर से ही संगत्याग; २. भक्तियोग में रुचि न रखनेवाले को उपदेश न करे; ३. विशाल मन्दिर-मठ बनाने के लिए अधिक उद्यम न करे; ४. अधिक ग्रन्थों का अध्ययन न करे तथा श्रीमद्भागवत और भगवद्गीता की कथा को आय का साधन न बनाये; ५. व्यवहार में प्रमाद न करे; ६. हानि-लाभ में दुःख-सुख से अभिभूत न हो; ७. देवताओं का अपमान न करे; ८. किसी भी जीव को न सताये; ९. सेवा और नाम के अपराधों से बचे; १०. श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त की निन्दा को कभी न सहन करे । उपरोक्त दस 'अंगों' का पालन किए बिना साधनभक्ति की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती । कुल मिलाकर श्रील रूप गोस्वामी ने बीस साधन बताएं हैं। ये सभी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। बीस में से पहले तीन—गुरुपाद- आश्रय, दीक्षा और श्रद्धाभाव सहित गुरुसेवा का प्रधान महत्त्व है। आगे अतिरिक्त साधन हैं : १. शरीर पर वैष्णवचिह्न, तिलकधारण करना (भाव यह है कि जब कोई वैष्णव के शरीर पर इन चिह्नों को देखेगा, तो उसे तत्काल कृष्णस्मृति होगी । श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि वैष्णव वह है, जिसके दर्शन से श्रीकृष्ण की स्मृति हो; अतः यह आवश्यक है कि दूसरों को श्रीकृष्ण का स्मरण कराने के लिए वैष्णव शरीर पर तिलक लगाये); २. शरीर पर 'हरेकृष्ण' धारण करना; ३. भगवत्-मूर्ति और गुरुदेव को अर्पित हार-पुष्प को शरीर पर ग्रहण करना; ४. मूर्ति के आगे नृत्य करना; ५. मूर्ति अथवा गुरु को देखते ही दण्डवत् प्रणाम करना; ६. खड़े होकर स्वागत करना; ७. मार्ग में मूर्ति की शोभायात्रा के पीछे- पीछे चलना (इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि आज भी अनेक मन्दिरों में, विशेषतः विष्णुमन्दिरों में यह प्रथा है कि मन्दिर में स्थापित बड़ी अचल मूर्ति के अतिरिक्त दूसरी छोटी मूर्तियाँ भी रहती हैं, जिन्हें सांध्य- काल में शोभायात्रा पर ले जाया जाता है । कुछ मन्दिरों में सांध्य में बड़ी शोभायात्रा की परिपाटी है, जिसमें नगाड़े बजते हैं, चँवर डूलाये जाते हैं और मूर्ति को पालकी में सिंहासन पर विराजित किया जाता है, जिसे भक्तजन धारण करते हैं। मूर्तियाँ मार्ग में निकलती हैं और आसपास के लोग प्रसाद लेने आते हैं। सब मूर्ति के पीछे-पीछे चलते हैं। बड़ा सुन्दर दृश्य होता है । मूर्ति को बाहर निकालते समय मन्दिर के सेवक उनके समक्ष आय-व्यय का पूरा ब्योरा रखते हैं। भाव यह है कि भगवत्-मूर्ति को