भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हो जाने से ही उच्च ब्राह्मणपद नहीं मिलता। बड़ी दृढ़ता से कर्तव्य और विधि का पालन करना परम आवश्यक है। श्रील रूप गोस्वामी कहते है कि यदि कोई नियमित रूप से भक्ति- योग के परायण रहे तो गिरने का कोई भय नहीं रहता। परन्तु यदि प्रसंगवश पतन हो जाय, तो भी वैष्णव को प्रायश्चित्त करने की आवश्यकता नहीं। दैवात् भक्तिसिद्धान्त से गिरकर निषिद्ध आचरण कर बैठने पर भी शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करना कर्तव्य नहीं है। भक्ति के विधि-विधान का पालन करने से ही अपनी स्थिति फिर प्राप्त हो जाती है। यह वैष्णव-शास्त्रों का रहस्य है। वस्तुतः अध्यात्म चेतना के तीन मार्ग हैं-कर्म, ज्ञान और भक्ति। भक्तियोग का कर्मकाण्ड अथवा मनोधर्ममय ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं। कहा जा चुका है कि शुद्धभक्ति में ज्ञान-कर्म का लेश भी नहीं रहता। वह उनसे सर्वथा शुद्ध होती है। इस संदर्भ में श्रील रूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत से प्रमाण देते हैं। एकादश स्कन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा है, "गुण-दोष का निर्णय इस प्रकार किया जा सकता है। भक्तियोगी पुरुष फिर कभी सकाम कर्म अथवा मनोधर्म का आश्रय नहीं लेते। आचार्यों और शास्त्रों के विधि-विधान का अनुसरण करते हुए भक्ति में निष्ठ रहना सर्वोपरि गुण है।" श्रीमद्भागवत (१.५.१७) में अन्यत्र भी इस वाक्य की पुष्टि है। नारदजी ने व्यासदेव से कहा, "जो अपने स्वधर्म को त्याग कर साक्षात् भगवान् हरि के चरणकमलों के आश्रित हो जाता है, उसका कभी अनिष्ट नहीं होता और सब अवस्थाओं में उसकी स्थिति सुरक्षित रहती है। यदि दुःसंग के कारण वह भक्ति से गिर भी जाय, अथवा भक्तिसाधन के पूरा होने से पहले ही मर जाय, तों भी उसे हानि नहीं होगी। दूसरी ओर, जो मनुष्य कृष्णभावना के बिना वर्णाश्रमधर्म का पालन करता है, उसे मानव- जीवन का यथार्थ लाभ नहीं होता। तात्पर्य यह है कि जो जीव यह जाने बिना कि सकामकर्मों के द्वारा भवबन्धन दूर नहीं हो सकता, उन्मत्त की भाँति इन्द्रियतृप्ति की क्रियाओं में ही लगे रहते हैं, उन्हें बारम्बार जन्म- मृत्यु के चक्र में फेंका जायगा। श्रीमद्भागवत के पाँचवे स्कन्ध में भगवान् ऋषभदेव का पुत्रों को उपदेश है, "सकामकर्मों जन्म-मृत्यु के बन्धन में ही फँसे रहते हैं। जब तक उनमें भगवान् वासुदेव के लिए प्रेमभाव का उदय नहीं होता, तब तक