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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

अध्याय ५ भक्तियोग का शुद्ध स्वरूप श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त सम्पूर्ण उपदेश का सार इस प्रकार है। जब तक विषयों की अथवा ब्रह्मज्योति में लीन होने की इच्छा है, तब तक शुद्ध भक्तियोग के मण्डल में प्रवेश नहीं हो सकता। यह प्रतिपादन करके श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि भक्तियोग सभी लौकिक विचारों से परे है और किसी राष्ट्र, जाति, समाज अथवा परिस्थिति-विशेष तक सीमित नहीं है। उसमें मनुष्यमात्र का अधिकार है। श्रीमद्भागवत में आया है कि भक्ति स्वरूप से अहैतुकी और अप्रतिहता होती है। भक्ति किसी लाभ की इच्छा के बिना की जाती है और कोई भी प्राकृत परि- स्थिति उसमें बाधा नहीं डाल सकती। उसमें भेदभाव के बिना सभी का अधिकार है; वह तो जीव का स्वरूपधर्म ही है। मध्यकाल में, भगवान् चैतन्य महाप्रभु के महान् पार्षद श्रीनित्यानन्द प्रभु के तिरोधान के बाद, पण्डितों का एक वर्ग अपने को नित्यानन्दवंशी गोस्वामी जाति कहने लगा। उनका दावा था कि भक्ति के साधन और प्रचार का अधिकार केवल उन्हीं का है। इस प्रकार कुछ समय तक उनका यह मिथ्या एकाधिकार चलता रहा। परन्तु गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के महान् आचार्य श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने उनके इस विचार को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया। पहले बड़ा गंभीर संघर्ष हुआ, पर अन्त में वे सफल रहे और अब यह ठीक-ठीक वास्तव में सिद्ध हो गया है कि भक्ति का अधिकार किसी जाति-विशेष तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त, भक्तिपरायण व्यक्ति ब्राह्मण के पद को अपने-आप प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार भक्ति आन्दोलन के लिए श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का संघर्ष सफल रहा है। उनके इस सिद्धान्त के आधार पर विश्व का अथवा ब्रह्माण्ड का कोई भी प्राणी गौड़ीय वैष्णव बन सकता है। जो कोई शुद्ध वैष्णव बन जाता है, वह शुद्धसत्त्व में स्थित हो जाता है, इसलिए प्राकृत-जगत् की सर्वोत्तम पात्रता-सत्त्वगुण में स्थिति उसे अपने-आप प्राप्त रहती है।