भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ भक्ति के अंगों के प्रमाण सद्गुरु-पादाश्रय श्रीमद्भागवत (११.३.२१) में प्रबुद्ध महाराज निमि से कहते हैं, "हे राजन् ! निश्चित जानो कि प्राकृत-जगत् में लेशमात्र भी सुख नहीं है। इस दुःखमय स्थान में सुख की प्रतीति भ्रममात्र है। यथार्थ सुख का जिज्ञासु सद्गुरु को ढूंढे और दीक्षा के द्वारा उनका आश्रय ले। गुरु वही बनने योग्य है, जो स्वयं युक्ति और विमर्श द्वारा शास्त्रों के सिद्धान्तों में निष्णात् हो और दूसरों को भी इन सिद्धान्तों में निष्ठ कर सके। जो सम्पूर्ण सांसारिक कामनाओं का त्याग कर भगवान् के शरणागत हो गए हैं, वे महापुरुष ही सद्गुरु हैं। मनुष्यजीवन परमानन्द की प्राप्ति के लिए है। अतः सभी को सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति को गुरु न बनाए जो महामूर्ख हो, जिसे शास्त्र की आज्ञा का ज्ञान न हो, जिसका चरित्र संदिग्ध हो, जो भक्ति की विधि को न मानता हो, अथवा जिसने छः इन्द्रियतृप्ति के साधनों को जीत न लिया हो। ये छः साधन हैं: जिह्वा, उपस्थ, उदर, क्रोध, मान और वाणी। जिसने इन छहों को वश में करने का अभ्यास किया है, वह सम्पूर्ण जगत् में शिष्य बना सकता है। ऐसे गुरु का आश्रय आध्यात्मिक जीवन में सम्पूर्ण उन्नति का आधार है। सद्गुरु के आश्रय में आने वाला भाग्यवान् निश्चित रूप से भवबन्धन से मुक्त हो जाता है। गुरु से कृष्णदीक्षा तथा भक्ति का उपदेश ग्रहण प्रबुद्ध मुनि ने राजा से आगे कहा, "हे राजन् ! शिष्य गुरु को केवल गुरु ही नहीं समझे; वरन् उन्हें श्रीभगवान् और परमात्मा का रूप समझना चाहिए। भाव यह है कि शिष्य गुरु को भगवान् का रूप समझे, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के बाह्य प्रकाश हैं।" सभी शास्त्रों से यह प्रमाणित है कि शिष्य गुरु को इसी रूप में माने। गुरुदेव के लिए पूर्ण श्रद्धा और