भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सजातीय भक्तों का सत्संग करना; ४३. कृष्णनाम का कीर्तन करना; ४४. मथुरामण्डल में रहना । इस प्रकार ये सब सम्मिलित रूप से चौंसठ अंग हैं। जैसे कहा गया है, पहले दस विधान भक्ति में प्रारम्भिक हैं । इसके बाद दस और अंग हैं; चौवालिस अतिरिक्त अंग हैं। अस्तु, साधनविधिभक्ति के कुल चौंसठ साधन हैं। इनमें से अर्चन, श्रीमद्भागवत-श्रवण, भक्तों का सत्संग, नाम- संकीर्तन तथा मथुरावास—ये पाँच प्रधान हैं। भक्ति के उपरोक्त चौंसठ साधनों में कायिक, वाचिक और मानसिक—सब क्रियायें आ जाती हैं। पूर्वकथन के अनुसार यह भक्ति की विधि है कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भगवत्सेवा के परायण हों। यह कैसे किया जाय, इसके प्रकार का निरूपण इन चौंसठ साधनों में है। इसके बाद श्रील रूप गोस्वामी नाना शास्त्रों से इनमें से कतिपय साधनों के प्रमाण प्रस्तुत करेंगे ।