भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधनभक्ति [२७ विस्मृति कभी न हो। इस सीधे से विधि-निषेध के अन्तर्गत सम्पूर्ण विधि- विधान आ जाते हैं। यह विधि ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सब वर्ण-आश्रमों के लिए है। विधि-विधान केवल ब्रह्म- चारियों के लिए ही आचरणीय नहीं; वरन् सभी के लिए पालनीय हैं। इसमें यह नहीं देखा जाता कि कोई ब्रह्मचारी है या संन्यासी, उत्तम साधक है अथवा कनिष्ठ। श्रीभगवान् का निरन्तर स्मरण, एक क्षण के लिए भी उन्हें न भूलना- इस सिद्धान्त का अनुसरण सभी को अवश्य करना चाहिए। यदि इस विधान को माना जाये तो अन्य सब विधि-निषेधों का अपने-आप पालन हो जायगा, क्योंकि अन्य सब विधान इस प्रधान सिद्धान्त के सेवक हैं। विधि-विधान और उनके फल का श्रीमद्भागवत (११.५.२-३) में उल्लेख है। राजा निमि को उपदेश करने आए नौ योगेश्वरों में से चमस मुनि उन्हें सम्बोधित करते हुये कहते हैं, "हे राजन ! ब्राह्मण आदि चारों वर्ण श्रीभगवान् के विराट्रूप से प्रकट हुए । ब्राह्मण उनके मुख से, क्षत्रिय बाहु से, वैश्य उरु से और शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए। इसी प्रकार संन्यासी मुख से, वानप्रस्थ बाहु से, गृहस्थ उरु से और ब्रह्मचारी चरणों से अलग- अलग उत्पन्न हुए।" इन वर्ण और आश्रमों का विभाजन गुणों के आधार पर है। भगवद्गीता में श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं कि उन्होंने चार-चार वर्ण आश्रमों की रचना मनुष्यों के निजी गुणों के आधार पर की है। जैसे एक ही शरीर के अलग अलग अंगों के भिन्न-भिन्न कार्य होते हैं, वैसे ही गुण और स्थिति के अनुरूप वर्ण और आश्रमों के अपने-अपने कर्तव्यकर्म हैं। परन्तु इन सभी कर्मों के लक्ष्य श्रीभगवान् हैं। जैसा भगवद्गीता में आया है, वे परम भोक्ता हैं। अतः चाहे कोई संन्यासी हो या शूद्र, अपने कर्मों से भगवान् को प्रसन्न करता है। श्रीमद्भागवत में भी इसका प्रमाण है- "सब को अपने-अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। परन्तु कर्तव्य-कर्म की पूर्णता इसी में है कि इनसे भगवान् का सन्तोष हो।" इस प्रकार आज्ञा है कि अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार कर्म करता हुआ अपनी क्रियाओं से भगवान् को प्रसन्न करे। जो ऐसा नहीं करता, वह अपनी स्थिति से नीचे अधम योनियों में गिर जायगा। उदाहरणार्थ, भगवान् के मुख से उत्पन्न ब्राह्मण का कर्तव्य 'शब्दब्रह्म' का प्रचार करना है। ब्राह्मण मुख है, इसलिए उसे शब्दब्रह्म को प्रसारित करना है और भगवान् के लिए भोजन भी करना है। वैदिक विधान है कि