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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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२६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नहीं होता। पर दूसरों का अवश्य नाश होता है। नाश होता है, अर्थात् इस मनुष्ययोनी की प्राप्ति होने पर भी वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो पाते और इस प्रकार इस स्वर्ण अवसर को खो बैठते हैं। ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि प्रकृति के नियम उसे कहाँ फेंक रहे हैं। यदि कोई मनुष्य-योनि में अपनी कृष्णभावना को जागृत नहीं करता तो उसे ८४,००,००० योनियों में जन्म-मृत्यु के चक्र में फेंक दिया जायगा और उसका आत्मस्वरूप खोया रहेगा। जीव-योनियाँ अनेक हैं, कोई नहीं जानता कि वह आगे पौधा बनेगा, पशु अथवा, पक्षी या कुछ और। अपनी आद्यस्वरूपभूत कृष्णभावना को पुनः उद्भावित करने के लिए रूप गोस्वामी का परामर्श है कि किसी न किसी प्रकार हमें अपना मन दृढ़ता से श्रीकृष्ण में निवेशित कर देना चाहिए। ऐसा करके परिणाम में मृत्यु से निर्भय हो जायें। मरने के बाद हमारी गति क्या होगी, हमें पता नहीं, क्योंकि हम पूर्ण रूप से प्रकृति के नियमों के परवश हैं। एकमात्र भगवान् श्रीकृष्ण का प्रकृति पर नियन्त्रण है। इसलिए यदि हम निष्कपट भाव से श्रीकृष्ण का आश्रय ले लें तो नाना योनियों के चक्र में वापस फेंके जाने का भय न रहेगा। निष्छल भक्त निश्चित रूप से कृष्णलोक में प्रवेश करेगा, जैसा भगवद्गीता से प्रमाणित है। 'पद्मपुराण' में भी इसी पद्धति का विधान है। वहाँ कहा है कि निरन्तर भगवान् विष्णु का स्मरण करना चाहिए। श्रीकृष्ण के इस नित्य चिन्तन को 'ध्यान' कहते हैं। विधान है कि मन को विष्णु पर एकाग्र करके ध्यान करे। पद्मपुराण के अनुसार, ध्यान के द्वारा मन को श्रीविष्णु में निवेशित कर देना चाहिए, जिससे क्षणभर को भी उनका विस्मरण कभी न हो। चेतना की इसी अवस्था का नाम 'समाधि' है। अपने जीवन की क्रियाओं को इस प्रकार ढालने के लिए हमें सदा प्रयत्न करते रहना चाहिए, जिससे विष्णु (कृष्ण) का स्मरण निरन्तर रह सके। इसका नाम कृष्णभावनामृत है। ध्यान चाहे चतुर्भुज विष्णु का किया जाय, अथवा द्विभुज श्रीकृष्ण का, एक ही बात है। 'पद्मपुराण' कहता है कि जिस-किसी प्रकार सदा श्रीविष्णु का चिन्तन करे, किसी भी परिस्थिति में उनकी विस्मृति न हो। यह सम्पूर्ण विधानों में सबसे मूलभूत है। जब किसी कर्म का विधान किया जाता है, तो उसके साथ कुछ निषेध भी होते हैं। जब यह विधान किया गया है कि निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए तो यह निषेध भी समझना चाहिए कि उनकी