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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 380 में से

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नाना प्रकार के वस्त्रालंकार बनाता है और भक्ति का सर्वांग सुन्दर आचरण करने के लिए अनेक संकल्प करता है। साधनभक्ति की श्रेणी में होते हुए भी यह प्रेममयी सेवा रागानुगा है। अस्तु, साधनभक्ति की वैधी और रागानुगा—दो श्रेणियां सिद्ध हुईं। रूप गोस्वामी ने 'वैधीभक्ति' की व्याख्या इस प्रकार की है : “जब राग अथवा रागानुगा भगवत्सेवा के बिना केवल और गुरु अथवा शास्त्र का आज्ञा के बल पर भगवत्सेवा में प्रवृत्ति होती है, उसे 'वैधीभक्ति' कहते हैं।” 'वैधीभक्ति' का श्रीमद्भागवत (२.१.५) में भी वर्णन है, जहाँ शुक- देव गोस्वामी मुमुर्षु महाराज परीक्षित का उनके योग्य आचरण का निर्देश किया है। महाराज परीक्षित की शुकदेव से भेंट मरने से केवल सात दिन पहले हुई। उस समय राजा अपने मरण-काल के कर्तव्य के विषय में बहुत चिन्तित थे। दूसरे-दूसरे कितने ही ऋषि वहाँ पधार चुके थे, पर कोई उन्हें उपयुक्त निर्देश नहीं दे सका। ऐसे में शुकदेव जी ने उन्हें आज्ञा दी— “हे राजन् ! यदि सात दिन बाद आने वाली भयावह मृत्यु का सामना तुम निर्भय होकर करना चाहते हो तो अविलम्ब भगवान् श्रीहरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करने लगो।” यदि कोई हरेकृष्ण महामन्त्र का श्रवण- कीर्तन करता हुआ भगवान् श्रीकृष्ण को निरन्तर स्मरण रखे तो मृत्यु कभी भी क्यों न आय, उसे कोई भय नहीं रहेगा। शुकदेव गोस्वामी के वाक्यों में कहा गया है कि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, अतः नित्य उन्हीं में कथा का श्रवण करना चाहिए। शुकदेवजी ने देवताओं का श्रवण-कीर्तन करने को नहीं कहा है। मायावादियों का मत है कि किसी भी नाम का कीर्तन किया जा सकता है; वह नाम चाहे श्रीकृष्ण का हो अथवा किसी देवता का, दोनों का एक परिणाम होगा। परन्तु वास्तव में यह सत्य नहीं है। श्रीमद्भागवत के प्रमाण के अनुसार, केवल भगवान् विष्णु (कृष्ण) का ही श्रवण-कीर्तन करना है। शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को परामर्श दिया है कि मृत्युभय की निवृत्ति के लिए सब प्रकार से निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए। वे यह कहते हैं कि भगवान् 'सर्वात्मा' हैं, अर्थात् सबके परमात्मा हैं। श्रीकृष्ण को 'ईश्वर' भी कहा गया है; क्योंकि वे सबके अन्तर्यामी परम नियन्ता हैं। अतः यदि किसी प्रकार हम श्रीकृष्ण में आसक्त हो जायें तो वे हमें सब प्रकार के भय से मुक्त कर देंगे। भगवद्गीता में उल्लेख है कि भगवान् के भक्त का कभी नाश