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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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२४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। यह 'विकर्म' का फल है। 'विकर्म' उस कर्म को कहते हैं, जिसे नहीं करना चाहिए। इसके उपचाररूप में साधनभक्ति का आचरण करना है। इस अभ्यास के मुख्य अंग ये हैं—प्रातः काल मंगल-आरती (अर्चन) करना, कुछ प्राकृत क्रियाओं से बचना, गुरुवन्दन आदि। अन्य बहुत से विधि- विधानों का पालन भी करना है, जिनका वर्णन आगे क्रमानुसार किया जायगा। इन साधनों से उन्माद दूर करने में सहायता मिलेगी। वैद्य मनुष्य के मस्तिष्करोग को दूर करता है और यह साधनभक्ति माया के कारण बद्धजीव की उन्मत्तता को मिटा देती है। नारद मुनि ने इस साधनभक्ति का उल्लेख श्रीमद्भागवत (७.१.३२) में किया है। वे महाराज युधिष्ठिर से कहते हैं, "हे राजन् ! जिस किसी उपाय से मन को श्रीकृष्ण में लगाना है।" इसी का नाम कृष्णभावनामृत है। आचार्य का कर्तव्य है कि ऐसे उपाय करें जिससे शिष्य का चित्त श्रीकृष्ण में एकाग्र हो जाय। यही साधनभक्ति का उपक्रम है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस उद्देश्य से हमें एक प्रामाणिक कार्यक्रम दिया है, जो हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन पर आधारित है। यह कीर्तन इतना दिव्य शक्तिसम्पन्न है कि इसके साधन से श्रीकृष्ण में तत्काल आसक्ति हो जाती है। इससे 'साधनभक्ति' का सूत्रपात होता है। जिस किसी प्रकार मन को श्रीकृष्ण में निवेशित करना है। सन्तप्रवर अम्बरीष महाराज ने राज्य का दायित्व होते हुए भी अपने मन को श्रीकृष्ण में लगा रखा था। इस प्रकार जो कोई अपने मन को एकाग्र करने का साधन करेगा, वह अपनी स्वरूपभूत कृष्णभावना का पुनर्जागरण करने में बहुत शीघ्र सफल होगा। इस साधनभक्ति का भी दो भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है। पहली, 'वैधी' नामक साधनभक्ति में गुरु-आज्ञा अथवा शास्त्रप्रमाण के आधार पर विविध विधानों का पालन करना अनिवार्य है। इसमें तर्क अथवा प्रमाद का प्रश्न ही नहीं बनता, विधि का पालन आवश्यक कर्तव्य है। दूसरी, 'रागानुगा' साधनभक्ति की प्राप्ति तब होती है जब साधक विधि का पालन करता हुआ श्रीकृष्ण में अधिक अनुरक्त हो जाता है और सहज प्रेमवश भक्ति करने लगता है। जैसे किसी साधक-भक्त को प्रातः काल मंगल आरती के समय उठने का आदेश दिया जाय। प्रारम्भ में वह गुरु-आज्ञा के अनुसार प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर आरती करता है, पर कालान्तर में उसका इस कार्य में यथार्थ अनुराग हो जाता है। इस आसक्ति का उदय होने पर वह स्वतः मूर्ति का शृंगार करने लगता है,