भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनभक्ति [ २३ यहाँ श्रील रूप गोस्वामी द्वारा भक्तियोग का सामान्य वर्णन हुआ है। पूर्व में, भक्ति की साधनरूपा, भावरूपा और प्रेमरूपा, इन तीन श्रेणियों का उल्लेख है। अब श्रील रूप गोस्वामी साधनभक्ति का विवेचन करते हैं। साधन का अर्थ किसी कार्य-विशेष में इन्द्रियों को लगाना होता है। अतः साधनभक्ति का अर्थ है अपनी सब इन्द्रियों से श्रीकृष्ण की सेवा करना। कुछ इन्द्रियाँ ज्ञान-अर्जन के लिए हैं तो कुछ संकल्प, संवेदन और विचार को कार्यरूप देने के लिए हैं। इस प्रकार साधन का अभिप्राय मन और इन्द्रियों को भक्तियोग के आचरण में लगाना हुआ। यह साधन किसी अस्वाभाविक (कृत्रिम) गुण को विकसित करने के लिए नहीं है। जैसे, कोई बालक चलना सीखता है। यह चलना अस्वाभाविक नहीं है। चलने की योग्यता मूल रूप में बालक में होती है; इसलिए केवल थोड़े साधन से वह भली प्रकार चलने लगता है। इसी भाँति, भगवद्भक्ति जीव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। आदिवासी जैसे असभ्य मनुष्य तक प्रकृति के नियम से घटने वाली किसी अद्भुत घटना के प्रति नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते; वे तब यह समझते हैं कि इस अद्भुत घटना अथवा कार्य के पीछे किसी दैवी सत्ता का हाथ अवश्य है। अतएव यह भावना जीव मात्र में है, चाहे बद्धावस्था में सुप्त रूप में हो क्यों न रहे। प्राकृत दोषों के आवरण से शुद्ध हो जाने पर यह कृष्णभावना कहलाती है। ऐसे विधि-विधान हैं, जिनसे हम अपनी इन्द्रियों और मन को इस प्रकार लगा सकते हैं कि हमारा सोया हुआ कृष्णप्रेम जागृत हो जाय, ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़े अभ्यास से बच्चा चलने लगता है। जिसमें चलने की मूल क्षमता नहीं है, वह कितना भी अभ्यास क्यों न करे, पर चल नहीं सकता। कृष्णभावना को किसी भी साधन से सिद्ध नहीं किया जा सकता। वास्तव में ऐसा कोई साधन नहीं है। वह तो नित्यसिद्ध है। परन्तु जब जीव भक्ति को, जो उसका आन्तरिक गुण है, विकसित करना चाहे, तो ऐसे कुछ साधन हैं जिनका आचरण करने से वह सोया हुआ गुण जागृत हो जायगा। इसी अभ्यास का नाम साधनभक्ति है। मायाशक्ति के वशीभूत हुआ जीव अस्वाभाविक प्रमत्त दशा में है। श्रीमद्भागवत में कहा है, "सामान्यतः बद्धजीव उन्मत्त रहता है क्योंकि वह निरन्तर उन्हीं क्रियाओं में तत्पर है, जो बन्धन और दुःख का कारण बनती हैं।" मूल रूप में आत्मा सच्चिदानन्दमय है। प्राकृत क्रियाओं में पड़ जाने के कारण ही वह दुःखी, क्षणिक और पूर्ण रूप से अज्ञानी हो गया