भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ साधनभक्ति श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृतसिन्धु में भक्ति की तीन श्रेणियों का वर्णन किया है—साधनभक्ति, भावभक्ति तथा प्रेमाभक्ति। इनमें से प्रत्येक के अनेक उपभेद हैं। सामान्यतः साधनभक्ति में दो विशेषतायें हैं। भावभक्ति में चार विशेषतायें हैं तथा प्रेमाभक्ति में छः विशेषतायें हैं। श्रील रूप गोस्वामी क्रमशः इन सब का विवेचन करेंगे। इस सन्दर्भ में रूप गोस्वामी कहते हैं कि कृष्णभावना अथवा भक्ति- योग के पात्रों का उनकी अपनी-अपनी रुचि के अनुसार वर्गीकरण किया जा सकता है। उनका कथन है कि भक्ति का साधन पूर्वजन्म से आनुपूर्वी रूप में निरन्तर चला आता है। भक्ति से कुछ न कुछ पूर्व-सम्बन्ध के बिना कोई भी मनुष्य भक्तिमार्ग में प्रवेश नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ, कोई इस जीवन में भक्ति का थोड़ा सा साधन करता है। उसका साधन पूर्ण चाहे न हो, परन्तु जितना साधन किया है, वह नष्ट नहीं होगा। अगले जन्म में वह इससे आगे साधन में लग जायगा। इस प्रकार भक्ति का साधन निरन्तर चलता रहता है। परन्तु यदि ऐसा पूर्वक्रम न हो और कोई अकस्मात् शुद्धभक्त के उपदेश में रुचि लेने लगे तो उसे भी अंगीकार किया जा सकता है; वह भी भक्ति में उन्नति कर सकता है। चाहे जो हो, जिनकी भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों को समझने में स्वाभाविक रुचि है, केवल मनोधर्म और तर्क के परायण रहनेवालों की तुलना में उनके लिए भक्तियोग सुगम है। इस कथन के समर्थन में प्राचीन विद्वानों के बहुत से प्रमाण हैं। उनके सामान्य मत के अनुसार, चतुर तार्किक जिस सिद्धान्त को यत्नपूर्वक सिद्ध करते हैं, उसे उनसे प्रबल तार्किक अपनी युक्ति के बल पर काटकर अन्यथा सिद्ध कर देते हैं। इस प्रकार तर्क के पद की कुछ भी प्रतिष्ठा नहीं है। अतएव श्रीमद्भागवत आचार्यों का अनुगमन करने को कहती है।