भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
DevanagariHindipublished380 पृष्ठ
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शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ २१ परन्तु आप इतने महान् हैं, यह मैं नहीं जान सका ।'' अस्तु, पाण्डवों को ऐसी दुर्लभ स्थिति प्राप्त थी। यद्यपि श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् और देवाधि- देव हैं, फिर भी वे इन पाण्डवों की भक्ति, सख्य और प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ रहे। यह भक्तियोग की अगाध महिमा को सिद्ध करता है। वह भगवान् को भी वश में कर सकती है। भगवान् महान् हैं; पर भक्ति की महिमा उससे भी बढ़कर है, क्योंकि वह उन्हें भी आकर्षित कर लेती है। जो लोग भक्तियोग में नहीं हैं, वे यह कभी नहीं समझ सकते कि भगवत्सेवा की कितनी अतुल महिमा-गरिमा है।