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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु के लक्षणों की चरम मूर्ति श्रीमती राधारानी हैं। श्रीकृष्ण को मदनमोहन कहा जाता है, वे कोटि-कोटि कंदर्प-दर्प-दलन हैं। परन्तु राधारानी तो और भी अधिक आकर्षक हैं, यहाँ तक कि वे श्रीकृष्ण तक को आकृष्ट कर लेती हैं। अतः भक्तजन उन्हें मदनमोहनमोहनी कहते हैं। भक्ति का आचरण करने का अर्थ राधारानी के चरणचिन्हों का अनुसरण करना है। इसीलिए वृन्दावन में भक्तजन राधारानी का आश्रय लेते हैं, जिससे उनकी भक्ति सिद्ध हो जाय । कहने का भाव यह है कि भक्ति प्राकृत-जगत् की क्रिया नहीं है; वह तो प्रत्यक्ष रूप से राधारानी के नियंत्रण में आती है। भगवद्गीता में प्रमाण है कि महात्मा पुरुष दैवी प्रकृति-राधारानी के आश्रित हैं। अतः साक्षात् श्रीकृष्ण की अंतरंगा शक्ति द्वारा संचालित होने के कारण भक्ति स्वयं श्रीकृष्ण को भी अपने वश में कर लेती है। श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीमद्भागवत (११.१४.२०) में इस सत्य को स्वीकार किया है "हे उद्धव ! भक्तों की प्रबल भक्ति मुझे जिस प्रकार आकर्षित कर सकती है, वैसे योग, सांख्य, धर्म, वेदान्त स्वाध्याय, तप, त्याग, दान, आदि पुण्यकर्म नहीं कर सकते ।" भक्तों की भक्ति के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के आकृष्ट होने का वर्णन श्रीमद्भागवत (७.१०.४३-४४) में नारदजी ने किया है। राजा युधिष्ठिर प्रह्लाद महाराज का गुणगान कर रहे थे, उस समय नारदजी ने उन्हें सम्बोधित किया। सच्चा भक्त सदा दूसरे भक्तों की क्रियाओं का महिमागान करता है। युधिष्ठिर महाराज प्रह्लाद जी का गुणगान कर रहे थे, जो शुद्धभक्त का लक्षण है। शुद्धभक्त अपने को कभी महान् नहीं समझता। वह तो निरन्तर दूसरे-दूसरे भक्तों को ही अपने से श्रेष्ठ मानता है। राजा सोच रहे थे, "प्रह्लाद महाराज भगवान् के यथार्थ भक्त हैं, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ।" ऐसे समय में नारदजी ने उनसे कहा, "युधिष्ठिर ! इस संसार में एकमात्र तुम पाण्डव ही भाग्यशाली हो, क्योंकि तुम्हारे घर में साक्षात् नराकृति परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण रहते हैं। वे औरों से बचते हैं, पर किसी भी परिस्थिति में तुम्हारा साथ नहीं छोड़ते। जिन परमेश्वर को दूसरे नहीं जानते, वे ही तुम्हारे साथ भाई, मित्र और सेवक तक बन कर रह रहे हैं। निश्चय ही तुम से बढ़कर भाग्यवान् त्रिभुवन में नहीं है।" भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा अपना विश्वरूप प्रकट करने पर अर्जुन बोला, "हे कृष्ण, आपको अपना सखा मान कर मैंने "हे कृष्ण ! हे सखे !"-इस प्रकार पुकार कर आपका बहुत प्रकार से अपमान किया।