भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १६ सकता है; परन्तु हजारों जन्मों तक यत्न करने पर भी इन साधनों से भक्ति दुर्लभ ही रहती है ।" श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद महाराज का वचन है कि केवल निजी प्रयास से अथवा अधिकारी पुरुषों के उपदेश से भक्तियोग की प्राप्ति नहीं हुआ करती । इसके लिए विषयवासना से रहित शुद्धभक्त के चरणार- विन्द का रजप्रसाद चाहिए । श्रीमद्भागवत (५.६.१८) में नारदजी युधिष्ठिर से कहते हैं, "हे राजन् ! भगवान् मुकुन्द (श्रीकृष्ण) ही पाण्डवों और यादवों के शाश्वत् स्वामी (रक्षक) हैं। वे तुम्हारे गुरु, सर्वविध शिक्षक, आराध्य देव हैं, इष्ट और प्रेमास्पद हैं तथा सब प्रकार से कुलपति हैं। अधिक क्या, कभी-कभी तो वे सेवक की भाँति तुम्हारी आज्ञा-पालन तक करते हैं। राजन् ! तुम कितने भाग्यवान हो ! तुम पर भगवान् श्रीकृष्ण के इस कृपाप्रसाद की दूसरे तो कल्पना भी नहीं कर सकते ।" इस श्लोक का भाव यह है कि भगवान् मुक्ति सुगमता से दे देते हैं, परन्तु भक्तियोग किसी दुर्लभ जीव को ही देते हैं। कारण यह है कि भक्तियोग से भगवान् स्वयं भक्त के क्रीतदास हो जाते हैं । भक्ति का सान्द्रानन्द स्वरूप श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यदि ब्रह्मानन्द को करोड़ों गुणा कर दिया जाय, तो भी भक्तिसुख के सागर के एक परमाणु की भी बरा- बरी वह नहीं कर सकता । हरिभक्तिसुधोदय में प्रह्लाद महाराज भगवान् नृसिंह को अपनी प्रार्थना से प्रसन्न करते हुए कहते हैं, "हे जगद्गुरु भगवन् ! आपके साक्षात्कार के विशुद्ध सुखरूप सिन्धु में मग्न हुए मुझ को इस सुख की तुलना में ब्रह्मानन्द गौ के खुर जैसा अत्यन्त तुच्छ लगता है ।" इसी प्रकार श्रीधर स्वामी द्वारा विरचित श्रीमद्भागवत की 'भावार्थदीपिका' टीका में प्रमाणित है, "भगवन् ! आपके भक्तिरसामृतरूप सागर में विहरण करते हुए आपके कथामृत का आस्वादन करने वाले परमानन्दमग्न कोई- कोई भाग्यवान् भक्तजन भक्तियोग के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सुख को तृण के समान समझते हैं ।" श्रीकृष्णाकर्षिणी श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि भक्ति श्रीकृष्ण को भी आकर्षित कर लेती है। श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं; परन्तु भक्ति श्रीकृष्ण आकर्षिणी है। भक्ति