भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८] भक्तिरसामृतसिन्धु श्रीचैतन्य महाप्रभु ने एक समय इस अंतरंग भक्त को अपना साक्षात्कार कराया था और उससे किसी इच्छित ऐश्वर्य को माँग लेने को कहा था । परन्तु श्रीधर ने श्रीमन्महाप्रभु से निवेदन किया कि वह किसी प्राकृत ऐश्वर्य की इच्छा नहीं रखता । उसे अपनी स्थिति में पूर्ण सुख था; वह बस इतना चाहता था कि श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में उसकी अनन्य निष्ठा और भक्ति हो । यह शुद्धभक्तों की स्थिति है । यदि वे निरन्तर दिन में चौबीस घण्टे भक्तियोग में तत्पर रह सकें, तो फिर उन्हें और कुछ नहीं चाहिए । उन्हें तो मुक्ति अथवा ब्रह्मैक्य के सुख की इच्छा तक नहीं होती । 'नारदपंचरात्र' में कहा है कि जिसमें भक्ति का कुछ भी विकास हुआ हो, वह पुरुष धर्म, अर्थ, काम अथवा पाँच प्रकार की मुक्ति से होने वाले सुख को बिलकुल तुच्छ समझता है । शुद्धभक्त के हृदय में ऐसा कोई सुख प्रवेश तक नहीं कर सकता । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सुख तो दासियों के समान अभिवादन करते हुए भक्ति रूप महारानी के पीछे-पीछे चला करते हैं । भाव यह है कि शुद्धभक्त को किसी भी स्रोत से मिलने वाले सुख का अभाव नहीं रहता । उसे कृष्णसेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए । परन्तु यदि वह कोई अन्य इच्छा करे भी, तो उसके माँगे बिना ही भगवान् उसे पूरा कर देते हैं । शुद्धभक्ति की सुदुर्लभता परमार्थ की प्रारंभिक दशा में स्वरूप-साक्षात्कार के लिए नाना प्रकार के तप, त्याग आदि साधनों का विधान है। यदि कोई साधक विषय-वासना से रहित हो, तो भी भक्तियोग की प्राप्ति दुर्लभ है। स्वयं साधन करने पर अधिक आशा नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण जिस किसी को भक्ति का दान नहीं देते । श्रीकृष्ण प्राकृत सुख अथवा मुक्ति तो दे सकते हैं, पर इतनी सरलता से किसी को भक्तियोग में नहीं लगाते । वास्तव में भक्तियोग की प्राप्ति शुद्धभक्त की कृपा से ही होती है । चैतन्य- चरितामृत (मध्य १६.१५१) में कहा है, "श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त—गुरुदेव और स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा से ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । भक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है ।" भक्ति की दुर्लभता को 'तन्त्रशास्त्र' ने भी स्वीकार किया है। शिवजी सती से कहते हैं : "हे साध्वि ! तत्त्वज्ञानी को भवबन्धन से मुक्ति मिल सकती है और वैदिक यज्ञादि के पुण्यफल से पूर्ण विषय सुख हो