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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 380 में से

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शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १७ आधुनिक प्राकृत उन्नति की चकाचौंध से मोहित लोग मूर्खतापूर्वक समझते हैं कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन मन्दों के लिए है। वे सोचते हैं, "विषय साधनों वाला मैं इन से श्रेष्ठ हूँ; मुझे सुन्दर आवास, परिवार और मैथुन का सुख प्राप्त है।" वे नहीं जानते कि किसी भी क्षण वे अपनी प्राकृत स्थिति से बाहर फेंके जा सकते हैं। अज्ञानवश उन्हें पता नहीं कि यथार्थ जीवन नित्य है। शरीर के तात्कालिक सुख जीवन के लक्ष्य नहीं हैं; अज्ञानरूपी घोर अन्धकार के कारण ही लोग प्राकृत सुखों की उन्नति की चकाचौंध पर मोहित हो रहे हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि प्राकृत विद्या की उन्नति मनुष्य को उत्तरोत्तर अधिक मूढ कर देती है, क्योंकि उसकी चकाचौंध से वह अपना यथार्थ स्वरूप भुला बैठा है। यह उसका नाश है; कारण, मनुष्यजीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राकृत बन्धन से छूटना है। प्राकृत जड विद्या के विकास से लोग भवबन्धन में दिन-पर-दिन और पड़ते जा रहे हैं। उनके लिए इस महाविनाश से उद्धार की कोई आशा नहीं। 'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज भगवान् नृसिंह से प्रार्थना करते हैं, "देव ! आपके चरणारविन्द में मेरा बारम्बार यही निवेदन है कि आपमें मेरी दृढ़ अनन्य भक्ति हो। बस, यही इच्छा है कि मेरी कृष्णभावना में स्थिर निष्ठा हो, क्योंकि कृष्णभावना और भक्तियोग का मुख इतना प्रबल होता है कि उसके साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि सब सिद्धियाँ अपने-आप सुलभ हो जाती हैं।" वास्तव में शुद्धभक्त इनमें से किसी सिद्धि की अभिलाषा नहीं रखता, क्योंकि कृष्णभावनाभावित भक्तियोग का सुख इतना दिव्य और अपरिमेय हुआ करता है कि किसी अन्य सुख की उससे तुलना नहीं हो सकती। सिद्धान्त है कि किसी भी अन्य क्रिया से मिलने वाले सुख का सागर तक कृष्णभावना के सुख के एक बिन्दु के समान भी नहीं हो सकता। अतएव जिस मनुष्य ने थोड़ा भी शुद्ध भक्तियोग का विकास कर लिया हो, वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से मिलने वाले अन्य सब प्रकार के सुख को सहज में तिलांजलि दे सकता है। खोलवेचा श्रीधर नामक श्रीचैतन्य महाप्रभु का एक परम भक्त था। वह अत्यन्त अकिंचन था। वह केले के पत्ते बेचा करता था, जिससे उसकी नगण्य सी आय थी। ऐसी स्थिति में भी वह अपनी आय का आधा भाग गंगा-पूजन पर व्यय करता और शेष अंश से जैसे-तैसे काम चलाता।

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