भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १५ अनुसार सुख के तीन भेद ये हैं : १. विषयों का सुख २. परब्रह्म से अपने को एक मानने का सुख तथा ३. कृष्णभावना से प्राप्त होने वाला सुख । 'तन्त्रशास्त्र' में शिवजी सती से कहते हैं, “हे साध्वि ! जिसने भगवान् गोविन्द के चरणों में शरणागत होकर शुद्ध कृष्णभावना का विकास कर लिया है, वह बड़ी सुगमता से निर्विशेषवादियों द्वारा अभिलाषित सभी सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है; इसके अतिरिक्त, वह शुद्धभक्तों को मिलने वाले परमानन्द का आस्वादन कर सकता है ।” शुद्ध भक्तियोग का सुख परमोच्च है, क्योंकि वह शाश्वत् है । प्राकृत सिद्धियों अथवा ब्रह्मैक्य से होने वाला सुख क्षणभंगुर होने के कारण तुच्छ है । प्राकृत सुख से पतन का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, यहाँ तक कि निर्विशेष ब्रह्म के सायुज्य से प्राप्त अप्राकृत सुख तक से गिरने की पूरी सम्भावना रहती है । देखा जाता है कि परम विद्वान् और लगभग तत्त्व-साक्षात्कार के स्तर पर पहुँचे हुए मायावादी संन्यासी भी कभी-कभी राजनीतिक अथवा सामाजिक परोपकार-कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं । इसका कारण यह है कि निर्विशेष के ज्ञान में उन्हें कोई आत्यन्तिक सुख नहीं मिलता; इसीलिए वे बाध्य होकर प्राकृत स्तर पर उतर आते हैं और एक बार फिर प्रापंचिक कार्यों में फँस जाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। परन्तु पूर्णतया कृष्ण- भावनाभावित पुरुष किसी भी प्रकार के प्राकृत स्तर पर फिर कभी नहीं उतरता । वे चाहे कितने भी मोहक और आकर्षक क्यों न हों, वह भली भाँति जानता है कि कोई प्राकृत परोपकार कार्य कृष्णभावना के दिव्य कर्मों की तुलना नहीं कर सकता । यथार्थ में सफल हुए योगियों को आठ प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं । पहली 'अणिमा' सिद्धि के द्वारा इतना सूक्ष्म बना जा सकता है कि पत्थर तक में प्रवेश किया जा सके । आधुनिक विज्ञान ने भी इस सिद्धि को प्राप्त किया है—उसके द्वारा भू-खनन किया जाता है । इसी प्रकार अन्य सभी सिद्धियाँ भी वस्तुतः प्राकृत कलायें हैं । उदाहरणार्थ, एक योगसिद्धि से मनुष्य इतना हल्का हो जाता है कि जल-वायु में तैर सकता है । आधुनिक वैज्ञानिकों को इसमें भी सफलता मिली है । वे वायुमण्डल में उड्डयन करते हैं, जल पर तैरते हैं और जल के नीचे यात्रा करते हैं । इन सब योगसिद्धियों की प्राकृत उपलब्धियों से तुलना करने पर