भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरसों की मैत्री-वैर स्थिति (२) [ ३४७ 'ललितमाधव' में श्रील रूपगोस्वामी का उल्लेख है, "कंस की रंग- भूमि में श्रीकृष्ण को आया देखकर कंस के आचार्य का मुख विकार को, मल्ल लालिमा को, मित्र गण्डस्थल की उन्नति को, दुष्ट लोग प्रलय को, ऋषि ध्यान को, देवकी माताएँ आदि गरम-गरम आँसुओं को, योद्धा रोमांच को, इन्द्र आदि देवता विस्मय को, दास लास्य को और वनितामण्डली कटाक्ष को प्राप्त हुई।" इस वाक्य में नाना प्रकार के रसों के मिश्रण का वर्णन है; परन्तु रसाभास नहीं है। इसी प्रकार का एक वाक्य जिसमें रसाभास नहीं है, 'ललितमाधव' में पाया जाता है। ग्रन्थकार सब पाठकों को आशीर्वचन देते हुए कहते हैं, "यद्यपि श्रीभगवान् अपने बाँयें हाथ की एक उँगली पर पर्वत को उठा सकते हैं; फिर भी वे सदा दीन और विनम्र बने रहते हैं। अपने प्रिय भक्तों पर उनकी कृपा निरन्तर रहती है। इन्द्रयज्ञ को बन्द कराकर उन्होंने इन्द्र के द्वेष को परास्त कर दिया। वे सब युवतियों के लिये सम्पूर्ण आनन्द का विधान करने वाले हैं। वे विभो तुम्हारी सदा रक्षा करें !"