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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अध्याय ५१ रसाभास रसाभास अर्थात् विरोधी रसों के मिश्रण तीन प्रकार के होते हैं— उपरस, अनुरस तथा अपररस। श्रीकृष्ण का साक्षात्कार करके एक निर्विशेषवादी कह उठा, "जब कोई संसार के सम्पूर्ण दोषों से मुक्त हो जाता है तो समाधि में दिव्या- नन्द की अनुभूति होती है। परन्तु हे आदिदेव ! हे आदिपुरुष ! आपके दर्शन से मुझे उसी सुख की प्राप्ति हो रही है।" इस रसाभास का नाम शान्त उपरस है, क्योंकि यह निर्विशेषवाद और सविशेषवाद के मिश्रण से हुआ है। एक अन्य वाक्य इस प्रकार है, "जहाँ भी मेरी दृष्टि जाती है वहीं- वहीं आपका स्वरूप देखता हूँ। अतएव मैं जान गया हूँ कि आप निर्विकार ब्रह्मज्योति और सब कारणों के परम कारण हैं। इस प्रकट सृष्टि में आपके बिना और कुछ भी नहीं है।" यह उपरस का द्वितीय उदाहरण है। जिस समय श्रीकृष्ण का अन्तरंग सखा मधुमंगल व्यंग्य मुद्रा में उनके सामने नाच रहा था तो उसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया और वह परिहास में कहने लगा, "हे नाथ ! मैं आपसे कृपा की याचना करता हूँ।" यह सख्यप्रीति और शान्तरस के उपरस का दृष्टान्त है। कंस अपनी बहन देवकी से बोला, "हे बहन ! जबसे मैंने तेरे पुत्र कृष्ण को देखा है तब से मुझे लगता है कि वह पर्वतों के समान बलशाली मल्लों को भी मार सकता है। अतएव अब मैं निश्चिन्त हो गया हूँ कि बड़े भयंकर युद्ध से भी उसको कोई भय नहीं हो सकता।" यह वत्सल उपरस का उदाहरण है। 'ललितमाधव' में श्रील रूपगोस्वामी ने कहा है, "याज्ञिक ब्राह्मणों की सब स्त्रियाँ युवती थीं। वे श्रीकृष्ण की ओर वृन्दावन की गोपियों के समान ही आकृष्ट हो गईं। इस आकर्षणवश उन्होंने श्रीकृष्ण को भोजन कराया।" यहाँ दो भक्तिरस हैं—मधुर और वत्सल और इनका परिणाम है शृंगार उपरस ।