भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५५ शास्त्र की अवज्ञा करनेवाले बौद्ध एवं अन्य मतावलम्बी प्रायः कहते हैं कि भगवान् बुद्ध के ऐसे कितने ही भक्त हैं जो उनकी सेवा के परायण हैं; अतः उन्हें भी भक्त समझा जाना चाहिए। इस तर्क के उत्तर में रूप गोस्वामी कहते हैं कि बौद्धों को भक्त नहीं माना जा सकता। यद्यपि भगवान् बुद्ध श्रीकृष्ण के अवतार मान्य हैं, परन्तु ऐसे अवतारों के अनुयायी वैदिकज्ञान में अधिक उन्नत नहीं होते । वेदाध्ययन का अर्थ श्रीभगवान् परमेश्वर हैं—इस निश्चय पर पहुँचना है। इसलिए जो मत श्रीभगवान् के परमेश्वरत्व का निराकरण करे, वह त्याज्य है, क्योंकि वह नास्तिकवाद है। वेदों के प्रमाण की अवज्ञा और जनसाधारण के कल्याण हेतु वैदिकशास्त्र की शिक्षा देने वाले महान् आचार्यों की निन्दा करना नास्तिकवाद ही है। श्रीमद्भागवत ने भगवान् बुद्ध को श्रीकृष्ण का अवतार माना है, परन्तु उसी भागवत में उल्लेख है कि भगवान् बुद्ध नास्तिक मनुष्यों को मोहित करने के लिए अवतरित हुए थे। अतः उनका दर्शन नास्तिकों के मोहन के लिए ही है, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोई जिज्ञासा कर सकता है, "श्रीकृष्ण नास्तिकवाद क्यों फैलायेंगे ?" इसका उत्तर यह है कि श्रीभगवान् की इच्छा थी कि वेदों के नाम पर उस समय चल रही हिंसा को रोका जाय । धर्मध्वजी लोग मांसाहार जैसी हिंसक क्रियाओं के लिए वेदों का दुरुपयोग कर रहे थे। ऐसे समय में पतित लोगों को वेदों की ऐसी भ्रान्त व्याख्या से बचाने के लिए भगवान् बुद्ध आए। भगवान् बुद्ध ने नास्तिकों के लिए नास्तिकवाद का उपदेश इसलिए किया, जिससे वे उनका अनुगमन करें और इस प्रकार युक्ति से उनकी, अर्थात् श्रीकृष्ण की भक्ति के परायण हो जायें । सद्धर्म की जिज्ञासा 'नारदीयपुराण' में कहा है, "जो भक्ति का यथार्थ अभिलाषी है, उसके सर्वाभीष्ट तत्काल सिद्ध हो जाते हैं।" श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए सर्वस्वत्याग 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जिसने प्राकृत इन्द्रियतृप्ति को त्याग कर भक्ति के सिद्धान्तों को अंगीकार कर लिया है, विष्णुलोक का ऐश्वर्य उसकी प्रतीक्षा में है।" तीर्थवास 'स्कन्दपुराण' में कथन है कि जो एक वर्ष, छः मास, एक मास