भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु अथवा एक पक्ष के लिए भी द्वारका में निवास करता है, उसका वरण करने के लिए वैकुण्ठ धाम और सारूप्य मोक्ष आतुर रहते हैं।" 'ब्रह्मपुराण' के अनुसार, "अहो ! भगवान् जगन्नाथ के दस योजन व्यापी पुरुषोत्तम क्षेत्र का माहात्म्य मन-वाणी के अगोचर कैसा अद्भुत है ! स्वर्गीय देवता भी यहाँ के निवासियों को चतुर्भुज देखते हैं। नैमिषारण्य के ऋषिसत्र में सूत गोस्वामी श्रीमद्भागवत की कथा कह रहे थे। वहाँ गंगा का माहात्म्य इस प्रकार है, "गंगा का जल भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अर्पित तुलसी की सौरभ से मिश्रित रहता है। यह गंगाजल निरन्तर श्रीकृष्ण की पावन कीर्ति प्रचारित कर रहा है। जहाँ-जहाँ यह प्रवाहित होता है, वहाँ सब कुछ बाहर-भीतर से शुद्ध हो जाता है।" अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक कुछ भी ग्रहण न करना) 'नारदीयपुराण' में आदेश है, “भक्ति-साधन के यथार्थ अभिलाषी को जितने अर्थ में निर्वाह हो जाय, उतना ही ग्रहण करना चाहिए।" तात्पर्य यह है कि भक्ति के विधान की उपेक्षा न करे और न ही उन विधानों को ग्रहण करे, जिनका सुगमता से पालन करने की सामर्थ्य न हो। उदाहरणार्थ, जैसे कोई कहे कि हरेकृष्ण महामन्त्र का कम से कम १,००,००० बार प्रति- दिन जप करना चाहिए। परन्तु यदि यह सम्भव न हो तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कम जप करे। सामान्यतः हम अपने शिष्यों को प्रतिदिन कम से कम सोलह माला का जप करने को कहते हैं। यह अवश्य करना चाहिए। यदि किसी दिन सोलह माला भी पूरी न हों अगले दिन पूरी करनी चाहिए। इस व्रत के पालन में सावधान रहे। यदि कोई दृढ़ता के साथ ऐसा नहीं करता तो वह प्रमाद का दोषी होगा। भगवत्सेवा के मार्ग में यह बड़ा अपराध है। यदि हम अपराधों को प्रोत्साहन देंगे तो भक्तिपथ पर अग्रसर नहीं हो सकेंगे। अच्छा होगा यदि अपनी योग्यता के अनुसार नियम बना कर निरन्तर उसका पालन किया जाय। इससे परमार्थ में उन्नति होगी। एकादशी व्रतपालन 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में उल्लेख है कि एकादशी का उपवासी सब पापों से मुक्त होकर आत्यन्तिक पुण्य को प्राप्त करता है। मुख्य बात उपवास करना नहीं, भगवान् गोविन्द के लिए अपने श्रद्धा और प्रेम को बढ़ाना है। एकादशीव्रत का वास्तविक कारण यह है कि शारीरिक आवश्यकताओं