भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु स्मरण कृष्णभावना का प्रधान सिद्धान्त है । प्राकृत हानि से उद्वेलित न हो, वरन् भगवान् के चरणकमलों में मन को निवेशित किए रहे । भक्त को शोक और मोह के वशीभूत नहीं होना चाहिए । 'पद्म- पुराण' में कहा है, "जिसका चित्त शोक अथवा क्रोध से आक्रान्त है, उसमें श्रीकृष्ण के स्फुरण की सम्भावना कैसे हो सकती है ?" देवता भक्त देवताओं का अपमान न करे । देवभक्त न होने का यह अर्थ नहीं कि उनका सम्मान ही न किया जाय । वैष्णव शिव अथवा ब्रह्मा का भक्त नहीं होता, परन्तु ऐसे सभी उच्च देवों को प्रणाम करना उसका कर्तव्य है । वैष्णवदर्शन के अनुसार चींटि तक को प्रणाम करना चाहिए, फिर शिव-ब्रह्मा जैसे महापुरुषों के सम्बन्ध में तो क्या कहना है । पद्मपुराण का वाक्य है, "सब देवताओं के ईश्वर के भी ईश्वर भगवान् श्रीकृष्ण की ही सदा आराधना करनी चाहिए; फिर भी ब्रह्मा, शिव आदि की अवज्ञा कभी न करे ।" किसी जीव को न सताना महाभारत का वाक्य है, "कृपामय पिता जैसे पुत्र को नहीं सताता है, इस प्रकार जो किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता है, उस शुद्ध अन्तः- करण पुरुष पर भगवान् बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।" आज के तथाकथित सभ्य समाज में पशुपीड़न का विरोध होता है; परन्तु साथ में नियमित वधशालायें भी चलती रहती हैं । वैष्णव को यह अच्छा नहीं लगता । वैष्णव पशुवध का समर्थन नहीं कर सकता और न कभी किसी प्राणी को सता सकता है ।