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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 380 में से

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पृष्ठ 88

अध्याय ८ वर्जनीय अपराध वैदिक शास्त्रों में ऐसे ३२ नियमों का उल्लेख है, जिनका पालन न करने से भगवत्सेवा-अपराध बनते हैं : १. भगवान् के मन्दिर में वाहन पर बैठे हुए अथवा जूते पहने-पहने प्रवेश नहीं करना चाहिए; २. भगवान् की प्रसन्नता के लिए जन्माष्टमी, रथयात्रा, आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना; ३. भगवत्-मूर्ति के आगे दण्डवत् प्रणाम करने में प्रमाद न करना; ४. भोजन के बाद हाथ-पैर धोये बिना मन्दिर में प्रवेश न करना; ५. दूषित अवस्था में मन्दिर-प्रवेश न करना (वैदिक शास्त्र के अनुसार परिवार में किसी की मृत्यु हों जाने पर सम्पूर्ण कुल कुछ काल के लिए दूषित हो जाता है । ब्राह्मणकुल के लिए दूषितकाल १२ दिन रहता है, क्षत्रियों और वैश्यों के लिए १५ दिन और शूद्रों के लिए ३० दिन); ६. एक हाथ से दण्डवत् प्रणाम न करना; ७. श्रीकृष्ण के आगे परिक्रमा न करना (मन्दिर की परिक्रमा की विधि यह है कि श्रीमूरित की दक्षिण दिशा से प्रदक्षिणा करे। मन्दिर के बाहर प्रतिदिन तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए); ८. मूर्ति के आगे पैर न फैलाए; ६. मूर्ति के सम्मुख उकड़वां नहीं बैठना चाहिए; १०. श्रीकृष्ण मूर्ति के आगे लेटे नहीं; ११. मूर्ति के आगे प्रसाद न खाय; १२. मूर्ति के आगे झूठ न बोले; १३. मूर्ति के समक्ष जोर से न बोले; १४. मूर्ति के आगे बात न करे १५. मूर्ति के आगे रुदन अथवा चीत्कार न करे; १६. मूर्ति के सम्मुख लड़ाई-झगड़ा न करे; १७. मूर्ति के आगे किसी को डाँटे नहीं; १८. मूर्ति के आगे भिक्षु को दान न दे; १६. मूर्ति के आगे किसी से कठोर वचन न कहे; २०. मूर्ति के आगे चर्म धारण न करे; २१. मूर्ति के सांनिध्य में किसी अन्य की स्तुति न करे; २२. मूर्ति के निकट कोई अपशब्द न कहे; २३. मूर्ति के निकट अधोवायु न छोड़े; २४. वैभव के अनुसार मूर्ति की अर्चना में प्रमाद न करे (भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि वे भक्त द्वारा समर्पित जल या पत्ते से भी संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान् ने यह